‘प्रात: समय श्री वल्लभ सुत को उठत ही रसना लीजिए नाम’
अष्टसखाओं के जीवन चरित्र वचनामृत पूर्ण

प.पू. श्री हरिराय जी महोदय श्री का कथा महोत्सव शानदार, यादगार
श्री गोवर्धननाथजी हेवली सत्संग मंडल द्बारा भेंट
अमरावती में प्रथम और अनूठा आयोजन
अमरावती /दि.8- अष्टसखा चरित्रामृत कथा के समापन दिवस पर हरिचंद्र मंगलम बडनेरा रोड में सप्त दिवसीय कथा का आयोजन हुआ. प. पू. 108 गोस्वामी पुरूषोत्तमलालजी के आज्ञानुसार श्री गोवर्धननाथजी हेवली सत्संग मंडल द्बारा आयोजन किया गया. प.पू. 108 श्री हरिरायजी महोदय श्री द्बारा अष्टसखाओं के जीवन चरित्र पर वचनामृत हुए.
कार्यक्रम आयोजन समिति में मुकेशभााई श्रॉफ के नेतृत्व में कार्याध्यक्ष महेशभाई सेठ, स्वागताध्यक्ष डॉ. घनश्याम बाहेती, संयोजक हितेशभाई राजकोटिया (लालाभाई) हेमंतभाई पच्चीगर, आशीष करवा, कन्हैया भाई पच्चीगर, राजेश संतोषिया, राजेन्द्र पारेख, विठ्ठल डिगे, रौनक नदियाना, दिलीप वजीर आदि ने अथक परिश्रम कर सप्तदिवसीय कथा को अलौकिक भव्यतम स्वरूप देने पूर्ण श्रमदान किया. पीयूष लखोटिया, ब्रजेश वसानी, हरिश सांगाणी तथा महिला मार्गदर्शक के रूप में वीणाबेन श्राफ, काश्मीराबेन सेठ, अल्पाबेन राजकोटिया, नीलमबेन पच्चीगर, दीपाबेन करवा, किरणबेन गगलानी, धर्मेशभाई गगलानी, शिल्पाबेन पारेख, दिव्या गगलानी, दीप्ती मुंदडा आदि का पूर्ण सहयोग रहा. कीर्तन समाज की ओर से गोविंदभाई दम्माणी, गिरीधर दम्माणी, देवकिसन लढ्ढा, राजूभाई धानक, ब्रजेश दम्माणी, मन्नूभाई जव्हेरी, भाविका श्राफ, ज्योतिबेन भैया, लताबेन मुुंदडा, वृंदाबेन श्रॉफ, चेतना जसापारा, पूजा वसानी, पुनीता श्राफ ने समारोह का आनंद द्बिगुणीत किया. अमरावती में इस तरह यह प्रथम व अनूठा आयोजन रहा.
सप्त दिवसीय कथा को जन-जन तक पहुंचाने में समाचार पत्रों के माध्यम से वचनामृत का सार पहुंचाने में श्याम दम्माणी ने सेवा दी. प.पू. के हस्ते उपरण पहनाकर आशीर्वाद प्राप्त किया. समापन दिवस पर नांददासजी व छितरस्वामी जी के चरित्र पर वचनामृत के महाप्रसाद उत्सव मनोरथी गो.वा. श्रीमती हिनाबेन दिनेशभाइ्र बावरिया परिवार श्रीमती पुष्पाबेन वृंदावन भाई शाह परिवार तथा मुख्य मनोरथी किरणभाई केशरदास भाई टापर परिवार के सदस्योसं ने ठाकुरजी व वल्लभाचार्य की छवि का पूजन किया. उत्सव मनोरथी श्रीमती रूपाबेन कृष्णदास भाई गगलानी परिवार व गोवा धनलक्ष्मीबेन धनश्रीभाई सोमैया परिवार के सदस्य पूजा व पुष्पमालार्पण में सम्मिलित आचार्यपीठ जेजे श्री हरिराय जी महोदय ने पुष्पमालार्पण कर सभी ने जे.जे. का आशीर्वाद लिया.
आज प. पू.हरिरायजी महोदय ने नंददासजी व स्वामी जी के जीवन प्रसंग पर
नंददासजी का चरित्र
और कवि स्तंभ बढिया
नंददासजी जडिया
आपके शब्दों का चुनाव बहुत संदर होता इसलिए आपको… पद मिला
तुलसीदास इन तीन भाईयों में सबसे बडे भाई थे.
महोदय जी ने सत्यम शिवम सुंदरम के हस्ताक्षर कर रामचरितमानस को प्रमाणित किया.
नंददास जी एक क्षत्राणी पर इतने आसक्त हो गयेे थे कि उनका चेहर देखे बिना जल ग्रहण नहीं करते थे. तीन दिनों तक जल नहीं पिया. क्षत्रीय कुरूक्षेत्र छोडकर परिवार सहित ब्रज जाने लगे. श्री नंददासजी उनके पीछे-पीछे गोकुल पहुंच गए. गुंसाईजी का प्रसंग सुनाया. विठ्ठलनाथ जी के चरणों में पद गाया. क्षत्राणी के नयनों में श्रीनाथजी के दर्शन करते थे.
प्रात: समय श्री वल्लभ सुत को
उठत ही रसना लीजिए नाम
नंददासजी ने सुरदास जी से बहुत समय तक कीर्तन सीखा उसके बाद उन्हें ब्रम्हसंबंध दिलाया गया तथा उन्होंने दीक्षा ली. रामानुज समुदाय के होने के बावजूद नंददासजी ने पुष्टि मार्ग अपनाया.
तुलसीदासजी ने गिरिराज को दंडवत नहीं की तब नंददासजी ने गिरिराज से विनती भी की कि आप धनुष्यबाण हाथ में लोगे तभी मेरे बडे भाई आपको दंडवत करेंगे. तुरंत नंददासजी पर कृपा कर गिरिराजजी ने मोरमुकुट से धनुष्यबाण बनाकर दर्शन किए.
तुलसीदासजी नतमस्तक होकर शरण में लेने का अनुरोध किया. गिरिराज जी ने कहा कि तुलसीदास आप राम के एकमात्र सखा हो, यहां तो 8 सखा है. आप अपना मार्ग ही संभालो. विनती कर तुलसीदासजी स्वधाम लौट गये. प्रेमबार , श्याम सगाई, रूक्मिणी मंगलम आदि ग्रंथ आपने लिखे. पत्रो द्बारा संवाद किया. आपने मानसी गंगा के पास पीपल के वृक्ष के नीचे अपनी कुटिया बना ली. वहीं पर निवास करने लगे. आपने रूपमंजीरी का प्रसंग सुनाया. एक प्रसंग के माध्यम से आपने गाया कि त्रिवेणी संगम में जहां यमुना गंगा का मिलन है, यमुना की मछली गंगाजल को छूकर वापस यमुनाजी में चली जाती है. तात्पर्य यह है कि एक बार जो ब्रज में बस गया. अन्यत्र नहीं जाता.
छीतस्वामी जी का प्रसंग
धीरू दादा चौबे के नाम से प्रख्यात है. छीतस्वामी को गुंसाई जी ने नारियल सिक्के का चमत्कार बताकर उनको अपने शरण में लिया. पद-
हरि गिरधर सो पहचान
कपट रूपधार छलने आयो.
हुई गिरधर से पहचान
नारियर में राख और नकली सिक्का लेकर छीत स्वामी गुंसाईजी की परीक्षा लेने गये थे. नारियल से पानी व खोपरा निकाला तथा सिक्के से समस्त सामग्री आई.
तात्पर्य – गुरू के आगे कभी तर्क लेकर न हीं जाना चाहिए.
श्री गुंसाईजी के स्वरूप को ध्यान में रखना श्री छीत स्वामी ने बीरबल को पद सुनाया.
जे वसुदेव किए पूरणा तप
सो फल फलित श्री वल्लभदेह
छीतस्वामी ने बीरबल को ही अपना यजमाना माना था. बीरबल ने भरपूर धन्य धान्य मुद्राए दी. किंतु गुंसाई जी को भगवान स्वरूप मानने से इंकार कर दिया. इससे छीत स्वामी स्तराधन धान्य वटी छोडकर वापस गुंसाईजी के पास गये गुंसाईजी जान गये तथा उनके भरण पोषण हेतु कलकत्ता के व्यापारी से कहा छीत स्वामी उनका पुरोहित बताकर सारा वैभव उन्हें दिलाया. इसके बाद गुरूचरणों में दंडवत किया और पद गाया.
हो चरणआत पत्र की छैया
कृपासिंधु श्री वल्लभनंद
छीतस्वामी गिरधर श्री विठ्ठल
सकल श्रुति नैया
सुजस बखान
प्राय नवनीत पालने झुले
श्री विठ्ठलाथ झुकावे तो
सम्मान अभिनंदन कार्यक्रम
सात दिनों से कथा को संबंधित बनाने हेतु संगीतकरो का अभिनंदन किया गया. श्री गोवर्धन हेवली सत्संग मंडल द्बारा जे जे को स्मृतिचिन्ह दिया गया. मनोरथ को महोत्सव बनाने में सहयोगी रहे सभी का भावभीना स्वागत किया गया.
(प्रस्तुति – श्याम दम्मानी नीलेश)





