फर्जी दस्तावेजों से जाति वैधता प्रमाणपत्र लेने वालों पर होगी एफआईआर
50 हजार तक जुर्माना

नागपुर /दि.27– महाराष्ट्र सरकार ने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर जाति वैधता प्रमाणपत्र हासिल कर सरकारी नौकरी, शिक्षा और आरक्षण का लाभ लेने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का फैसला किया है. सरकार ने कानून में संशोधन करते हुए अध्यादेश जारी किया है, जिसके तहत ऐसे मामलों में अब सीधे आपराधिक मामला दर्ज किया जाएगा और दोषियों पर 20 हजार से 50 हजार तक का जुर्माना लगाया जा सकेगा.
सरकार के अनुसार, अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी), अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), विशेष पिछड़ा वर्ग (एसबीसी), विमुक्त एवं घुमंतू जातियों के विद्यार्थियों और पात्र व्यक्तियों को सरकारी योजनाओं, उच्च शिक्षा, सरकारी नौकरी तथा आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों में चुनाव लड़ने के लिए जाति वैधता प्रमाणपत्र आवश्यक होता है. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में फर्जी दस्तावेज, नकली रिकॉर्ड और अधिकारियों के जाली हस्ताक्षरों के जरिए प्रमाणपत्र प्राप्त करने के कई मामले सामने आए हैं, जिससे वास्तविक पात्र लाभार्थियों को नुकसान हुआ है.
सरकार ने बताया कि इंजीनियरिंग सहित विभिन्न व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में भी फर्जी अनुसूचित जनजाति (एसटी) प्रमाणपत्र के आधार पर प्रवेश लेने के मामले सामने आए हैं. अब ऐसे मामलों में केवल प्रमाणपत्र रद्द ही नहीं होगा, बल्कि संबंधित व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई भी की जाएगी.
* अधिकारियों पर भी कार्रवाई
यदि कोई अधिकारी फर्जी प्रमाणपत्र के मामले में पुलिस शिकायत दर्ज कराने में लापरवाही करता है, तो उस पर 20 हजार का जुर्माना लगाया जाएगा और उसके खिलाफ विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई भी प्रस्तावित की जाएगी.
* फर्जी प्रमाणपत्र मिलने पर होगी दोबारा जांच
यदि किसी परिवार के पहले सदस्य का जाति वैधता प्रमाणपत्र बाद में फर्जी पाया जाता है, तो उसके आधार पर जारी परिवार के अन्य सदस्यों के प्रमाणपत्रों की भी दोबारा जांच की जाएगी. प्रमाणपत्र अवैध पाए जाने पर इसकी जानकारी संबंधित शैक्षणिक संस्थान या सरकारी विभाग को दी जाएगी.
* अपील की नई व्यवस्था
अब यदि जाति प्रमाणपत्र जांच समिति किसी आवेदन को खारिज करती है, तो संबंधित व्यक्ति 90 दिनों के भीतर प्राधिकरण के समक्ष अपील कर सकेगा. यदि वहां भी राहत नहीं मिलती है, तो वह उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकेगा. पहले आवेदन खारिज होने पर सीधे उच्च न्यायालय जाना पड़ता था.





