बागी सांसदों के मामले में उद्धव ठाकरे को बड़ी राहत
सुप्रीम कोर्ट में याचिका पर सुनवाई को मंजूरी

नई दिल्ली/मुंबई/दि.22- शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) गुट से अलग होकर डेप्यूटी सीएम एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल हुए छह सांसदों के मामले में सुप्रीम कोर्ट से उद्धव ठाकरे को आंशिक राहत मिली है. सर्वोच्च न्यायालय ने बागी सांसदों के विलय को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति जताई है. हालांकि, सांसदों के विलय पर तत्काल रोक लगाने की मांग को अदालत ने फिलहाल स्वीकार नहीं किया.
बता दे कि, हाल ही में ठाकरे गुट के छह सांसदों ने बगावत करते हुए शिंदे गुट का दामन थाम लिया था. इसके बाद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने भी उनके शिंदे गुट में विलय को मान्यता दे दी थी. इस फैसले को उद्धव ठाकरे के लिए बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा था.
* कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में दी चुनौती
ठाकरे गुट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर बागी सांसदों के विलय को चुनौती दी. याचिका में कहा गया कि जनप्रतिनिधियों द्वारा लगातार दल-बदल और बगावत की घटनाएं राजनीतिक दलों को कमजोर कर रही हैं. याचिका में यह भी तर्क दिया गया कि यदि इस प्रकार के राजनीतिक विलयों और दलबदल को बिना रोक-टोक स्वीकार किया जाता रहा, तो संविधान की दसवीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) का महत्व समाप्त हो जाएगा.
* सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी कर मांगा जवाब
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाला बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहाना की पीठ के समक्ष मामले की प्रारंभिक सुनवाई हुई. अदालत ने याचिका को सुनवाई योग्य मानते हुए सूचीबद्ध करने की अनुमति दी. साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने लोकसभा अध्यक्ष कार्यालय तथा संबंधित प्रतिवादी पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है. हालांकि अदालत ने बागी सांसदों के विलय पर तत्काल अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया.
* शिवसेना में बदला शक्ति संतुलन
छह सांसदों के शिंदे गुट में शामिल होने के बाद लोकसभा में शिंदे गुट के सांसदों की संख्या बढ़कर 13 हो गई है, जबकि ठाकरे गुट के पास अब केवल 3 सांसद बचे हैं. इस राजनीतिक घटनाक्रम ने महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना की आंतरिक शक्ति संतुलन को पूरी तरह बदल दिया है.
* ठाकरे गुट के लिए क्यों मानी जा रही है राहत?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भले ही सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल राहत नहीं दी हो, लेकिन याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति और नोटिस जारी होना ठाकरे गुट के लिए सकारात्मक संकेत है. अब इस मामले में अदालत की आगामी सुनवाई पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी. यदि अदालत ने याचिकाकर्ताओं के तर्कों को स्वीकार किया, तो बागी सांसदों के विलय और लोकसभा अध्यक्ष के निर्णय पर कानूनी सवाल खड़े हो सकते हैं. वहीं दूसरी ओर शिंदे गुट इस विलय को संविधान और संसदीय नियमों के अनुरूप बता रहा है. फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के बाद यह मामला एक बार फिर राजनीतिक और कानूनी बहस के केंद्र में आ गया है.