बालभारती के पाठ्यक्रम पर नया विवाद
कक्षा 6 वीं की मराठी पुस्तक से महाराष्ट्र के लोकनृत्य गायब

* अन्य राज्यों की कलाओं को मिला स्थान
पुणे/दि.2-महाराष्ट्र में एक ओर स्कूल शिक्षा में मराठी भाषा को मजबूत करने और सीबीएसई पैटर्न लागू करने पर जोर दिया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर बालभारती की पाठ्यपुस्तकों में लगातार सामने आ रही त्रुटियों को लेकर सवाल उठ रहे हैं. अब छठी कक्षा की मराठी पाठ्यपुस्तक में शामिल ‘लोकनृत्य’ पाठ को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है. आरोप है कि इस पाठ में महाराष्ट्र की समृद्ध लोकनृत्य परंपरा को पर्याप्त स्थान नहीं दिया गया, जबकि अन्य राज्यों के लोकनृत्यों को प्रमुखता से शामिल किया गया है.
जानकारी के अनुसार, छठी की मराठी पुस्तक के ‘लोकनृत्य’ पाठ में कुल पांच लोकनृत्यों का उल्लेख किया गया है. इनमें महाराष्ट्र का केवल एक लोकनृत्य ‘दिंडी’ शामिल है, जबकि शेष चार नृत्य अन्य राज्यों से संबंधित हैं. पाठ में पंजाब का भांगड़ा, गुजरात का रास, बिहार का आदिवासी नृत्य तथा छत्तीसगढ़ का बस्तर नृत्य शामिल किया गया है.
* महाराष्ट्र की सांस्कृतिक विरासत की अनदेखी का आरोप
शिक्षा और सांस्कृतिक क्षेत्र से जुड़े लोगों का कहना है कि महाराष्ट्र में लावणी, लेझीम, धनगरी गजा, गोंधळ, कोळी नृत्य, पोवाड़ा जैसी समृद्ध लोककलाओं की परंपरा रही है. ऐसे में प्राथमिक स्तर पर विद्यार्थियों को अपने राज्य की सांस्कृतिक धरोहर से परिचित कराना आवश्यक था. आलोचकों का कहना है कि विभिन्न क्षेत्रों के लोकनृत्यों को शामिल करने के साथ-साथ महाराष्ट्र की विविध लोककलाओं को भी पर्याप्त स्थान दिया जा सकता था.
* साहित्यकारों ने मुख्यमंत्री से हस्तक्षेप की मांग की
इस मुद्दे पर वरिष्ठ साहित्यकार डहीळरिव इहरश्रलहरपवीर गेीहळ समेत कई शिक्षाविदों और सांस्कृतिक चिंतकों ने आपत्ति दर्ज कराई है. श्रीपाद जोशी ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को पत्र लिखकर मामले में हस्तक्षेप की मांग की है. उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों को प्रारंभिक स्तर पर अपने राज्य की लोकसंस्कृति और सांस्कृतिक विरासत की व्यापक जानकारी मिलनी चाहिए. इसके लिए पाठ्यपुस्तक में पूरक सामग्री (रिजॉइंडर) जोड़कर तत्काल सुधार किए जाने की आवश्यकता है.
* बालभारती और एससीईआरटी की चुप्पी
विवाद बढ़ने के बावजूद राज्य शैक्षणिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एससीईआरटी) और बालभारती की ओर से अब तक कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी नहीं किया गया है. इसे लेकर भी शिक्षण क्षेत्र से जुड़े लोगों में नाराजगी देखी जा रही है.
* पहले भी विवादों में रही हैं पाठ्यपुस्तकें
यह पहला अवसर नहीं है जब बालभारती की पुस्तकों को लेकर विवाद सामने आया हो. इससे पहले तीसरी कक्षा की पुस्तक में पुणे स्थित भिडे वाडा का उल्लेख महाराष्ट्र की पहली स्कूल के रूप में किए जाने पर इतिहासकारों ने आपत्ति जताई थी. बाद में इसे देश की पहली बालिका विद्यालय के रूप में सुधारने की प्रक्रिया शुरू करनी पड़ी थी. हाल ही में चौथी कक्षा की गणित पुस्तक में भी कई मुद्रण और तथ्यात्मक त्रुटियां सामने आई थीं, जिनमें गणितज्ञ श्रीनिवासा रामानुजम के निधन की तारीख संबंधी गलती भी शामिल थी. पाठ्यपुस्तक मंडल ने तब आश्वासन दिया था कि अगली आवृत्ति में सभी त्रुटियों को सुधारा जाएगा.
* सरकार की भूमिका पर नजर
लोकनृत्य पाठ को लेकर उठे विवाद के बाद अब सभी की निगाहें राज्य सरकार और शिक्षा विभाग पर टिकी हैं. सांस्कृतिक संगठनों और शिक्षाविदों की मांग है कि पाठ्यपुस्तकों में महाराष्ट्र की लोककला, लोकनृत्य और सांस्कृतिक विरासत को उचित स्थान देकर विद्यार्थियों को अपनी जड़ों से जोड़ने का प्रयास किया जाए. अब देखना होगा कि सरकार इस विवाद पर क्या रुख अपनाती है और पाठ्यक्रम में किसी प्रकार का संशोधन किया जाता है या नहीं.





