शिंदे सेना प्रत्याशी किरण सरनाईक की ‘हेकडी’
अमरावती संभाग शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र का चुनाव

* भाजपा व राकांपा सहित शिंदे सेना के सांसदों व विधायकों से कोई पुछताछ नहीं
* संभाग के पांचों जिलों में महायुती के 3 सांसदों व 27 विधायकों से मेलमुलाकात तो दूर, टेलिफोनिक संपर्क भी नहीं
* महायुती के एक भी पदाधिकारी से शिंदे सेना प्रत्याशी किरण सरनाईक अब तक एक बार भी नहीं मिले
अमरावती/दि. 15 – अमरावती संभाग शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के विधान परिषद चुनाव में महायुति ने यह सीट एकनाथ शिंदे की शिवसेना के लिए छोड़ी है और मौजूदा शिक्षक विधायक किरण सरनाईक को अपना अधिकृत प्रत्याशी बनाया है. इसके बावजूद सरनाईक की चुनावी कार्यशैली को लेकर महायुति के भीतर सवाल उठने लगे हैं. आरोप है कि भाजपा और अजित पवार गुट की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के सांसदों-विधायकों को छोड़िए, सरनाईक ने अपनी ही पार्टी के जनप्रतिनिधियों तथा महायुति के पदाधिकारियों से भी अब तक संपर्क साधने की जरूरत नहीं समझी. संभाग के पांचों जिलों में फैले महायुति के सांसदों और विधायकों से मेल-मुलाकात तो दूर, टेलीफोन पर बातचीत तक नहीं किए जाने की चर्चा राजनीतिक गलियारों में है.
एक ओर शिंदे सेना के वरिष्ठ नेता तथा राज्य के उद्योग मंत्री उदय सामंत अमरावती आकर महायुति के घटक दलों से सरनाईक के पक्ष में काम करने का आह्वान कर चुके हैं, वहीं दूसरी ओर प्रत्याशी की ओर से सहयोगी दलों के जनप्रतिनिधियों को विश्वास में लेने के प्रयासों का अभाव दिखाई देने की बात कही जा रही है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब प्रत्याशी स्वयं सहयोगियों से संवाद नहीं साध रहे, तो महायुति के सभी घटक दलों को एकजुट कर चुनाव लड़ने की जिम्मेदारी कौन निभाएगा?
* सहयोगियों को विश्वास में लेने की पहल तक नहीं!
अमरावती संभाग के अमरावती, अकोला, वाशिम, यवतमाल और बुलढाणा इन पांच जिलों में महायुति के तीन प्रमुख दलों के 22 विधायक हैं. सहयोगी राष्ट्रीय युवा स्वाभिमान पार्टी के विधायक रवि राणा को शामिल करने पर यह संख्या 23 तक पहुंचती है. इसके अतिरिक्त संभाग से जुड़े लोकसभा सांसद और विधान परिषद सदस्य भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं. इसके बावजूद किरण सरनाईक की ओर से महायुति के जनप्रतिनिधियों के साथ बैठक कर चुनावी रणनीति तय करने, प्रचार की जिम्मेदारियां बांटने अथवा शिक्षक मतदाताओं तक पहुंचने के लिए संयुक्त नियोजन करने की पहल अब तक सामने नहीं आई है.
राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि सरनाईक ने नामांकन दाखिल करते समय भी महायुति के कई प्रमुख नेताओं और जनप्रतिनिधियों को संपर्क नहीं किया. भाजपा और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेताओं से दूरी की बात तो कही ही जा रही है, खुद शिंदे सेना के नेताओं को भी साथ लेकर चलने के मामले में उनकी कार्यशैली पर सवाल उठाए जा रहे हैं. महायुति के अधिकृत प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ते समय सहयोगी दलों के जनप्रतिनिधियों को विश्वास में लेना सामान्य राजनीतिक अपेक्षा मानी जाती है, लेकिन इस दिशा में अब तक सक्रियता दिखाई नहीं देने की बात सामने आ रही है.
* बच्चू कडू, भावना गवली और प्रतापराव जाधव से भी संपर्क नहीं?
शिंदे सेना के विदर्भ विभागीय नेता और विधायक बच्चू कडू को भी नामांकन के समय सरनाईक की ओर से फोन नहीं किए जाने की चर्चा है. इसी तरह यवतमाल-वाशिम क्षेत्र की विधान परिषद सदस्य भावना गवली तथा बुलढाणा के सांसद और केंद्रीय राज्यमंत्री प्रतापराव जाधव से भी प्रत्याशी द्वारा संपर्क साधे जाने की जानकारी सामने नहीं आई है. यदि यह स्थिति सही है, तो इसे केवल सहयोगी दलों के साथ समन्वय की कमी नहीं, बल्कि अपनी ही पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और जनप्रतिनिधियों को साथ लेकर चलने में भी चूक के रूप में देखा जा रहा है. शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र का चुनाव संभागव्यापी है. ऐसे में पांचों जिलों में संगठनात्मक संपर्क, स्थानीय नेताओं की भागीदारी और शिक्षक मतदाताओं तक पहुंच के लिए संयुक्त प्रयासों की जरूरत है. केवल पार्टी का अधिकृत प्रत्याशी घोषित हो जाना और वरिष्ठ नेताओं द्वारा समर्थन की अपील कर देना अपने आप में पर्याप्त नहीं माना जा सकता.
* उदय सामंत की अपील, लेकिन श्रीकांत देशपांडे की बगावत बरकरार
राज्य के उद्योग मंत्री उदय सामंत दो दिन पहले अमरावती आए थे. उन्होंने भाजपा, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और महायुति के अन्य नेताओं तथा जनप्रतिनिधियों से किरण सरनाईक के पक्ष में काम करने का आह्वान किया. लेकिन शिंदे सेना के लिए चुनौती केवल सहयोगी दलों को सक्रिय करने तक सीमित नहीं है. पार्टी के पूर्व विधायक प्रा. श्रीकांत देशपांडे भी बागी प्रत्याशी के तौर पर मैदान में हैं. देशपांडे शिक्षक क्षेत्र में लंबे समय से सक्रिय रहे हैं. ऐसे में उनकी उम्मीदवारी को लेकर पार्टी नेतृत्व की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है. अब तक उन्हें मनाने, नाम वापस लेने के लिए राजी करने अथवा बगावत से पैदा हुई स्थिति का समाधान निकालने के किसी ठोस प्रयास की सार्वजनिक जानकारी सामने नहीं आई है. इसके अलावा भाजपा के भी शेखर भोयर व संगीता शिंदे बागी प्रत्याशी के तौर पर मैदान में डटे हुए है. एक तरफ उद्योग मंत्री सहयोगी दलों से सरनाईक के पक्ष में काम करने की अपील कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ पार्टी एवं महायुती के ही बागी प्रत्याशियों की मौजूदगी चुनावी समीकरण को चुनौती दे रही है.
* अमरावती जिले में भी नाराजगी की चर्चा
अकेले अमरावती जिले में भाजपा, शिंदे सेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी से जुड़े कई जनप्रतिनिधि हैं. इनमें राज्यसभा सांसद डॉ. अनिल बोंडे, पूर्व सांसद नवनीत राणा, 7 विधानसभा सदस्य और 3 विधान परिषद सदस्य शामिल हैं. इसके बावजूद सरनाईक द्वारा इन नेताओं से संपर्क नहीं किए जाने की बात राजनीतिक चर्चाओं में उठ रही है. बताया जाता है कि अजित पवार गुट की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी से जुड़े एक विधान परिषद सदस्य से जब शिंदे सेना के कुछ मंत्रियों ने सरनाईक के समर्थन में काम करने का आग्रह किया, तो उन्होंने प्रत्याशी की ओर से नामांकन के समय संपर्क नहीं किए जाने का सवाल उठाया. उनका कथित जवाब था कि जब उम्मीदवार ने नामांकन भरते समय याद तक नहीं किया, तो उसके लिए काम क्यों किया जाए? इस कथित प्रतिक्रिया से महायुति के भीतर संवाद और समन्वय की कमी को लेकर उठ रहे सवालों को और बल मिला है.
* कल होनेवाले सम्मेलन में खुलेगी तस्वीर?
किरण सरनाईक के प्रचार के लिए कल शुक्रवार, 16 अक्तूबर को अमरावती के सांस्कृतिक भवन में सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है. इसमें राज्य के राजस्व मंत्री एवं जिला पालकमंत्री चंद्रशेखर बावनकुले, उद्योग मंत्री उदय सामंत, केंद्रीय राज्यमंत्री प्रतापराव जाधव और जिले के पूर्व सांसद आनंदराव अडसूल सहित महायुति के वरिष्ठ नेताओं के उपस्थित रहने की जानकारी दी गई है. अब निगाहें इस सम्मेलन पर टिकी हैं. देखना होगा कि संभाग के पांचों जिलों से कितने सांसद और विधायक इसमें शामिल होते हैं और क्या सरनाईक की ओर से अब तक संपर्क नहीं किए जाने का मुद्दा वरिष्ठ नेताओं के सामने उठता है. क्या इस सम्मेलन के बाद घटक दलों के बीच संवाद बढ़ेगा? क्या शिंदे सेना के बागी प्रत्याशी श्रीकांत देशपांडे को लेकर कोई पहल होगी? और क्या महायुति अपने संख्या बल को एकजुट चुनावी अभियान में बदल पाएगी?
फिलहाल, शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के इस चुनाव में महायुति के सामने चुनौती केवल अपने अधिकृत प्रत्याशी के पक्ष में समर्थन जुटाने की नहीं, बल्कि घटक दलों के बीच भरोसा कायम करने और संगठनात्मक तालमेल स्थापित करने की भी है. प्रत्याशी की ओर से सहयोगियों से संपर्क साधने में कथित उदासीनता चुनावी अभियान के लिए कितनी मुश्किलें पैदा करती है, इसका संकेत आगामी सम्मेलन और उसके बाद की गतिविधियों से मिल सकता है.





