बुजुर्ग पिता का उत्पीडन बेटे पर 5 लाख का जुर्माना
पिता के खिलाफ दायर याचिका खारिज

मुंबई /दि.28- बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम 2017 की धारा 105 का उपयोग किसी व्यक्ति को उसके खिलाफ चल रहे परिवारिक मुकदमेबाजी मेंं लाभ प्राप्त करने के साधन के रूप में अदालत ने बुजुर्ग पिता के अनावश्यक उत्पीडन के लिए बेटे पर 5 लाख रूपए का जुर्माना लगाया है और उसकी अपीलीय याचिका खारिज कर दी. अदालत ने बेटे से वसूली जानेवाली जुर्माने की रकम पिता को देने का निर्देश दिया है.
न्यायमूर्ति अजय गडकरी ओैर न्यायमूर्ति कमल खाता की पीठ ने जीतेन्द्र गोरख मेघ की याचिका को पूर्व आईएएस अधिकारी 75 वर्षीय पिता को कानूनी कार्यवाहियों में उलझाकर दबाव डालने और परेशान करने का प्रयास माना और कहा कि यह न्यायालय की प्रक्रिया का दुरूप्रयोग है. पीठ ने कहा कि न्यायालय की एकल पीठ के आदेश में अपीलीय न्यायालय तभी हस्तक्षेप करता है जब वह आदेश मनमाना, अनुचित, विकृत अथवा स्थापित विधि के सिध्दांतों की अवहेलना करनेवाला हो.
* क्या है मामला
अंधेरी निवासी याचिकाकर्ता जितेन्द्र गोरख मेघ ने अपने पिता गोरख गोविंद मेघ के खिलाफ पैतृक संपत्तियों में अपने वैधानिक हिस्से के लिए वर्ष 2015 में विभाजन का मुकदमा दायर किया था. याचिका में मांग की गई थी कि उनके पिता मानसिक बीमारी से पीडित है. इसलिए मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम 2017 की धारा 105 के अंतर्गत उनका परीक्षण एक स्वतंत्र चिकित्सीय मंडल से कराया जाना चाहिए. हाईकोर्ट की एकल पीठ के न्यायधीश ने उनकी चिकित्सकीय मंडल से परीक्षण कराने की याचिका अस्वीकार कर दी और माना कि धारा 105 का उद्देश्य मानसिक बीमारी से पीडित व्यक्ति की सुरक्षा करना है. इसे किसी विरोधी पक्ष द्बारा अपने मुकदमे में लाभ प्राप्त करने के लिए हथियार के रूप में प्रयोग नहीं किया जा सकता.





