महर्षि पब्लिक स्कूल में आदिवासी छात्र की मौत से मचा बवाल
7 छात्रों के बीमार पड़ने के बाद स्वास्थ्य व्यवस्था और प्रबंधन पर उठे गंभीर सवाल

* भोजन के बाद उल्टी-दस्त से बिगड़ी थी तबीयत, समय पर इलाज नहीं मिलने के आरोप
* आदिवासी विभाग की जांच में किचन और छात्रावास में मिली भारी अव्यवस्था
अमरावती/चिखलदरा/धारणी/दि.18 – अमरावती स्थित महर्षि पब्लिक स्कूल में अध्ययनरत 11वीं कक्षा के 16 वर्षीय आदिवासी छात्र राजेश बाबू बेठेकर की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत ने पूरे मेलघाट क्षेत्र में आक्रोश और चिंता का माहौल पैदा कर दिया है. छात्र की मौत के साथ ही छात्रावास में एक साथ सात विद्यार्थियों के बीमार पड़ने, भोजन के बाद उल्टी-दस्त की शिकायतें सामने आने, समय पर उपचार नहीं मिलने के आरोप तथा आदिवासी विभाग की जांच में सामने आई कथित अनियमितताओं ने मामले को और गंभीर बना दिया है. घटना के बाद आदिवासी सामाजिक संगठनों, जनप्रतिनिधियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने स्कूल प्रबंधन के खिलाफ कड़ी कार्रवाई, फौजदारी मामला दर्ज करने तथा स्कूल की मान्यता रद्द करने तक की मांग उठाई है. वहीं आदिवासी विकास विभाग ने पूरे प्रकरण की जांच शुरू कर दी है.
* मेलघाट के कारंजखेड़ा का था छात्र राजेश
जानकारी के मुताबिक, चिखलदरा तहसील के कारंजखेड़ा गांव निवासी राजेश बाबू बेठेकर एकात्मिक आदिवासी विकास प्रकल्प, धारणी के अंतर्गत नामांकित योजना से महर्षि पब्लिक स्कूल में 11वीं कक्षा का निवासी विद्यार्थी था. परिजनों और स्थानीय सूत्रों के अनुसार 15 अगस्त तक वह स्कूल में मौजूद था. उसी दिन शाम को उसे सिरदर्द, उल्टी, दस्त और कमजोरी की शिकायत शुरू हुई. इसके बाद उसकी हालत लगातार बिगड़ती चली गई. बताया जा रहा है कि छात्रावास में उसी दौरान अन्य विद्यार्थियों की तबीयत भी खराब हुई और कुल सात छात्र उल्टी-दस्त से पीड़ित हो गए. आरोप है कि छात्रों की हालत बिगड़ने के बावजूद उन्हें तत्काल अस्पताल में भर्ती नहीं कराया गया.
* भाई का आरोप, गंभीर हालत में भी नहीं मिला उचित उपचार
मृतक छात्र के बड़े भाई आशीष बेठेकर का आरोप है कि जब उन्हें राजेश की गंभीर स्थिति की जानकारी मिली, तो वे अमरावती पहुंचे. छात्रावास में पहुंचने पर शुरुआत में उन्हें अंदर जाने से रोका गया. बाद में जब वे अपने भाई तक पहुंचे तो राजेश बेहद कमजोर अवस्था में था और उसे आवश्यक चिकित्सा सहायता नहीं मिल रही थी. आशीष बेठेकर के अनुसार, छात्रावास के सिक रूम में अन्य बीमार विद्यार्थी भी पड़े हुए थे. उन्होंने परिवार को स्थिति की जानकारी दी और राजेश को गांव ले जाने का निर्णय लिया. पहले उसे बस से राहू तक लाया गया, फिर बोलेरो वाहन से हतरू स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया. रास्ते भर उसकी हालत बिगड़ती रही. रात करीब 12.30 बजे स्वास्थ्य केंद्र पहुंचने पर उपचार शुरू होने से पहले ही उसकी मौत हो गई. परिजनों का कहना है कि यदि राजेश को समय रहते अस्पताल में भर्ती कराया गया होता तो उसकी जान बच सकती थी.
* पांच छात्रों का अस्पताल में उपचार जारी
इसी बीच यह जानकारी सामने आयी कि, 16 अगस्त की रात इसी छात्रावास में रहनेवाले सात विद्यार्थियों को डायरिया और उल्टी-दस्त की शिकायत के साथ कुसुमांजली अस्पताल में उपचार के लिए लाया गया था. अस्पताल के चिकित्सकों के अनुसार, इनमें से दो विद्यार्थियों की स्थिति सामान्य होने पर उन्हें दवा देकर भेज दिया गया, जबकि पांच को भर्ती कर उपचार शुरू किया गया. चार छात्रों की हालत में सुधार बताया गया है, जबकि एक छात्र की किडनी प्रभावित होने के कारण उसका उपचार जारी है.
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* स्कूल प्रशासन पर लापरवाही के आरोप
घटना के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि छात्र गंभीर रूप से बीमार था, तो उसे तत्काल सरकारी या निजी अस्पताल में भर्ती क्यों नहीं कराया गया. आदिवासी विभाग के नियमों के अनुसार, निवासी विद्यालयों और छात्रावासों में रहने वाले विद्यार्थियों की तबीयत बिगड़ने पर तत्काल चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराना अनिवार्य है. स्थानीय नागरिकों, सामाजिक संगठनों और जनप्रतिनिधियों का कहना है कि यदि स्वास्थ्य प्रबंधन प्रभावी होता तो यह घटना टाली जा सकती थी. लोगों का आरोप है कि बीमार छात्र को अस्पताल पहुंचाने के बजाय घर भेजना मानवीय और प्रशासनिक दोनों दृष्टियों से गंभीर लापरवाही है.
* परिजनों की मांग, दोषियों पर सदोष मनुष्यवध का मामला दर्ज हो
राजेश की मौत के बाद कारंजखेडा और आसपास के क्षेत्रों में आक्रोश का माहौल है. परिजनों और ग्रामीणों ने मांग की है कि स्कूल के जिम्मेदार अधिकारियों, छात्रावास अधीक्षक तथा संबंधित कर्मचारियों के खिलाफ सदोष मनुष्यवध का मामला दर्ज किया जाए. परिवार का आरोप है कि शाला प्रशासन की लापरवाही के कारण एक आदिवासी छात्र की जान गई है. उन्होंने चेतावनी दी है कि जब तक दोषियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होती, तब तक वे आंदोलन जारी रखेंगे. * होस्टल में फूड पॉयजनिंग जैसी कोई बात नहीं
– स्कूल संचालक प्रशांत राठी ने रखा अपना पक्ष
वहीं महर्षि पब्लिक स्कूल के संचालक प्रशांत राठी ने इस पूरे मामले को लेकर अपना पक्ष रखते हुए कहा कि, स्कूल द्वारा संचालित होस्टल में करीब 450 विद्यार्थी रहते है और सभी का भोजन एक साथ ही बनता है. उसी भोजन का सेवन होस्टल के स्टाफ द्वारा भी किया जाता है. यदि फूड पॉयजनिंग जैसी कोई बात हो गई होती, तो इतने सारे लोगों की तबियत बिगडनी चाहिए थी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. बल्कि 5-6 बच्चों को ही उल्टी व दस्त की शिकायत हुई. प्रशांत राठी के मुताबिक, चुंकि उस दिन 15 अगस्त था और सुबह छात्रावास में झेंडा वंदन के बाद बच्चे दिन भर छात्रावास के बाहर घुमना-फिरना कर रहे थे. संभव है कि, इस दौरान उन्होंने बाहर भेलपुरी व पानीपुरी का सेवन किया हो और उस वजह से उन्हें उल्टी व दस्त की शिकायत हुई है. इस बात की ओर ध्यान जाते ही सभी बच्चों को तुरंत ही अस्पताल में इलाज हेतु भर्ती कराया गया था. वहीं राजेश बेठेकर को उसके परिजन उनके गांव में नागपंचमी के अवसर पर पूजा रहने की बात कहते हुए अपने साथ लेकर गए थे. संभवतः तबियत खराब रहते समय लंबी दूरी की यात्रा करने के दौरान राजेश बेठेकर की तबियत बिगड गई और गांव में उचित चिकित्सा सुविधा नहीं मिलने के चलते हालत और अधिक बिगडकर उसकी मृत्यू हो गई. जिसके बारे में प्रशासन की ओर से फिलहाल विस्तृत स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है.
* स्कूल प्रशासन और परिजनों के दावों में विरोधाभास
मामले में स्कूल प्रबंधन और परिजनों के दावों में स्पष्ट विरोधाभास दिखाई दे रहा है. महर्षि पब्लिक स्कूल के संचालक प्रशांत राठी का कहना है कि राजेश की तबीयत स्कूल में सामान्य थी और वह 14 अगस्त को नागपंचमी के अवसर पर अपने माता-पिता के साथ गांव गया था, जहां 16 अगस्त को उसकी मृत्यु हुई. उनका कहना है कि घटना की जानकारी भी उन्हें बाद में प्राप्त हुई. वहीं परिजनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय संगठनों का आरोप है कि राजेश की तबीयत स्कूल में ही खराब हुई थी और आवश्यक उपचार न मिलने के कारण उसकी जान गई.
* आदिवासी विभाग की जांच में मिली अव्यवस्था
घटना की गंभीरता को देखते हुए आदिवासी विकास विभाग के अप्पर आयुक्त संदीप गोलाईत ने स्वयं महर्षि पब्लिक स्कूल पहुंचकर जांच की. उन्होंने छात्रों से बातचीत की, छात्रावास और रसोईघर का निरीक्षण किया तथा व्यवस्थाओं का जायजा लिया. सूत्रों के अनुसार निरीक्षण के दौरान किचन और छात्रावास में व्यापक अस्वच्छता पाई गई. कई स्थानों पर साफ-सफाई की स्थिति संतोषजनक नहीं थी. यह भी सामने आया कि जिस संस्थान में प्रति छात्र प्रतिवर्ष लगभग 70 हजार रुपये खर्च होने का दावा किया जाता है, वहां मूलभूत सुविधाओं को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं. जांच के दौरान स्कूल परिसर में पर्याप्त सीसीटीवी निगरानी व्यवस्था नहीं होने की बात भी सामने आई. अप्पर आयुक्त ने कहा कि छात्र की मौत का वास्तविक कारण जांच के बाद ही स्पष्ट होगा, लेकिन यदि लापरवाही सामने आती है तो संबंधितों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी.
* सहायक आयुक्त ने मांगा विस्तृत प्रतिवेदन
आदिवासी विकास विभाग की सहायक आयुक्त ममता विठ्ठले ने भी मामले की गंभीरता को देखते हुए स्कूल प्रशासन को निर्देश दिए हैं कि वे मृत छात्र के गांव जाकर परिवार से जानकारी लें और विस्तृत प्रतिवेदन विभाग को सौंपें. विभागीय स्तर पर यह भी जांच की जा रही है कि छात्र के बीमार होने के बाद कौन-कौन से कदम उठाए गए थे और स्वास्थ्य प्रबंधन संबंधी नियमों का पालन किया गया था या नहीं.
* सामाजिक संगठनों का आक्रोश
घटना के बाद आदिवासी संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है. सामाजिक कार्यकर्ता अर्जुन युवनाते ने कहा कि यदि छात्र की हालत गंभीर थी तो उसे तत्काल अस्पताल में भर्ती कराया जाना चाहिए था. उन्होंने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच और दोषियों पर कार्रवाई की मांग की है. आरटीआई कार्यकर्ता संजय सोलंके ने आरोप लगाया कि गंभीर रूप से बीमार छात्र को उपचार के बजाय गांव भेजना अत्यंत गंभीर लापरवाही है. उन्होंने कहा कि आश्रमशाला या निवासी विद्यालय में प्रवेश लेने वाले छात्रों की सुरक्षा और स्वास्थ्य की जिम्मेदारी संस्थान की होती है.
वहीं सामाजिक कार्यकर्ता मन्नासिंह दारशिंबे ने आरोप लगाया कि स्कूल में आदिवासी विद्यार्थियों के साथ भेदभाव किया जाता है तथा छात्रावास और भोजन व्यवस्था में गंभीर खामियां हैं. उन्होंने चेतावनी दी कि यदि दोषियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई तो आदिवासी विभाग कार्यालय के सामने आंदोलन किया जाएगा.
* सांसद वानखडे ने भी उठाए सवाल
अमरावती के सांसद बलवंत वानखड़े ने मामले को गंभीर बताते हुए कहा कि यदि जांच में चिकित्सकीय लापरवाही या प्रशासनिक निष्क्रियता सामने आती है तो जिम्मेदार अधिकारियों और स्कूल प्रबंधन पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए. उन्होंने कहा कि किसी भी निवासी छात्रावास में बीमार छात्र को अस्पताल पहुंचाने के बजाय घर भेजना स्वीकार्य नहीं माना जा सकता.
* पहले भी विवादों में रहा है स्कूल
महर्षि पब्लिक स्कूल पहले भी आदिवासी विद्यार्थियों को मिलने वाली सुविधाओं और छात्रावास व्यवस्थाओं को लेकर विवादों में रहा है. अतीत में विभिन्न संगठनों ने स्कूल प्रशासन के खिलाफ आंदोलन किए थे और मान्यता रद्द करने की मांग भी उठाई थी. आरोप लगाए जाते रहे हैं कि आदिवासी विद्यार्थियों को मिलने वाली सुविधाएं अन्य विद्यार्थियों की तुलना में कमतर हैं. हालांकि स्कूल प्रबंधन इन आरोपों से लगातार इनकार करता रहा है.
* जांच के केंद्र में कई बड़े सवाल
अब इस पूरे प्रकरण में कई महत्वपूर्ण सवाल जांच का विषय बन गए हैं कि, क्या सात विद्यार्थियों के बीमार पड़ने के पीछे खाद्य विषबाधा जिम्मेदार थी, राजेश की तबीयत पहली बार कब बिगड़ी और उसे क्या उपचार दिया गया, गंभीर हालत में उसे अस्पताल के बजाय गांव भेजने का निर्णय किसने लिया, क्या छात्रावास में पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध थीं, क्या परिजनों को समय पर सही जानकारी दी गई, क्या भोजन और स्वच्छता संबंधी मानकों का पालन किया जा रहा था, क्या आदिवासी विभाग द्वारा नियमित निरीक्षण और निगरानी प्रभावी ढंग से की जा रही थी.
* पूरे प्रदेश की नजर जांच रिपोर्ट पर
राजेश बेठेकर की मौत ने एक बार फिर आदिवासी विद्यार्थियों के लिए संचालित निवासी विद्यालयों और आश्रमशालाओं की स्वास्थ्य एवं सुरक्षा व्यवस्थाओं पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है. मेलघाट सहित पूरे अमरावती संभाग में इस घटना को लेकर गहरा आक्रोश है. अब सभी की निगाहें आदिवासी विकास विभाग और प्रशासन की जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं. यह जांच न केवल एक छात्र की मौत की परिस्थितियों को स्पष्ट करेगी, बल्कि यह भी तय करेगी कि क्या वास्तव में लापरवाही हुई थी और यदि हुई, तो उसके लिए जिम्मेदार कौन है.