महाराष्ट्र में पांच वर्षों में 10 प्रतिशत महाविद्यालय बंद

उच्च शिक्षा व्यवस्था पर गहराता संकट

नागपुर/दि.3– केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की ‘ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन (एआईएसएचई)’ रिपोर्ट ने महाराष्ट्र की उच्च शिक्षा व्यवस्था की चिंताजनक तस्वीर सामने रखी है. रिपोर्ट के अनुसार राज्य में पिछले पांच वर्षों के दौरान लगभग 10 प्रतिशत महाविद्यालय बंद हो गए हैं या उनका अस्तित्व समाप्त हो गया है. इससे उच्च शिक्षा के क्षेत्र में संस्थागत संकट और गहराने की आशंका व्यक्त की जा रही है.
रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य में विश्वविद्यालयों की स्थिति पहले से चुनौतीपूर्ण थी, लेकिन अब महाविद्यालयों की संख्या में भी लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्थिति के पीछे सबसे बड़ा कारण शिक्षकों की भारी कमी है. महाराष्ट्र के सरकारी और अनुदानित महाविद्यालयों में 50 प्रतिशत से अधिक प्राध्यापक पद रिक्त पड़े हैं, जिसके कारण अधिकांश संस्थान अतिथि व्याख्याताओं और संविदा शिक्षकों के भरोसे संचालित हो रहे हैं.
* ग्रामीण महाविद्यालयों पर सबसे अधिक असर
पूर्णकालिक शिक्षकों की कमी, वित्तीय संसाधनों का अभाव तथा बुनियादी सुविधाओं की कमजोर स्थिति के कारण ग्रामीण और अर्धशहरी क्षेत्रों के महाविद्यालय राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद (एनएएसी) की रैंकिंग में पिछड़ रहे हैं. इसका सीधा लाभ निजी और स्वायत्त विश्वविद्यालयों को मिल रहा है, जहां छात्र बेहतर सुविधाओं के कारण आकर्षित हो रहे हैं. हालांकि कौशल आधारित पाठ्यक्रमों में लगभग 45 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की गई है, लेकिन उनकी फीस सामान्य विद्यार्थियों की पहुंच से बाहर होती जा रही है. इससे उच्च शिक्षा में आर्थिक असमानता बढ़ने और गरीब विद्यार्थियों के मुख्यधारा से बाहर होने की चिंता भी व्यक्त की जा रही है.
* रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष
राज्य की ‘कॉलेज डेंसिटी’ 32 से घटकर 28 पर पहुंच गई है. अर्थात 18 से 23 वर्ष आयु वर्ग के प्रति एक लाख युवाओं पर उपलब्ध महाविद्यालयों की संख्या कम हुई है. समय पर अनुदान नहीं मिलने और छात्र संख्या से जुड़ी कठोर शर्तों के कारण ग्रामीण क्षेत्रों के अनेक महाविद्यालय बंद हो गए. कुछ छोटे शिक्षण संस्थान बड़े निजी शैक्षणिक समूहों में विलीन हो गए. लगभग 42 प्रतिशत महाविद्यालयों में आधुनिक प्रयोगशालाओं, डिजिटल पुस्तकालयों और अन्य उन्नत शैक्षणिक सुविधाओं का अभाव है.
* छात्राओं की शिक्षा पर भी असर
रिपोर्ट में बताया गया है कि छात्रावासों की कमी और सुरक्षा संबंधी चुनौतियों के कारण छात्राओं के बीच पढ़ाई बीच में छोड़ने की प्रवृत्ति बढ़ रही है. पिछले कुछ वर्षों में छात्राओं के ड्रॉपआउट की दर में लगभग 14 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की गई है.
* शोध गतिविधियों को झटका
शोध एवं नवाचार क्षेत्र भी प्रभावित हुआ है. रिपोर्ट के अनुसार अनुसंधान निधि में 38 प्रतिशत तक की कमी आई है, जिससे शोध परियोजनाओं, नवाचार और पेटेंट निर्माण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है. मार्गदर्शकों और फेलोशिप की कमी के कारण पिछले तीन वर्षों में पीएचडी करने वाले विद्यार्थियों की संख्या में 22 प्रतिशत गिरावट दर्ज की गई है.
* शिक्षा विशेषज्ञों ने जताई चिंता
पूर्व कुलपति एवं वरिष्ठ शिक्षाविद् डॉ. सुधीर गव्हाणे ने कहा कि देश के 1420 विश्वविद्यालयों में से केवल 30 प्रतिशत तथा महाविद्यालयों में से मात्र 20 प्रतिशत संस्थानों ने ही एनएएसी मूल्यांकन कराया है. उन्होंने कहा कि दशकों से रिक्त पड़े प्राध्यापक पद, शोध के लिए अपर्याप्त वित्तीय सहायता और शिक्षा क्षेत्र की लगातार उपेक्षा उच्च शिक्षा के भविष्य के लिए गंभीर खतरा बन चुकी है. उन्होंने चेतावनी दी कि यदि शिक्षा क्षेत्र की समस्याओं का शीघ्र समाधान नहीं किया गया तो गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा प्राप्त करना विद्यार्थियों के लिए और अधिक कठिन हो जाएगा तथा राज्य की युवा पीढ़ी का भविष्य प्रभावित हो सकता है.

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