सत्ता के लिए संतुलन जरूरी है

लोकतंत्र हो, समाज हो या अंतरराष्ट्रीय राजनीति-इतिहास बार-बार एक ही सबक देता है कि जब सत्ता का केंद्र एक ही हाथ में सिमट जाता है, तब उसके निर्णयों की कीमत पूरी मानवता को चुकानी पड़ती है. शक्ति का असंतुलन केवल राजनीतिक समस्या नहीं होता, वह नैतिक, मानवीय और सभ्यतागत संकट भी पैदा करता है. पश्चिम एशिया की हालिया घटनाओं को इसी दृष्टि से देखने की आवश्यकता है.
इराक से अमेरिकी सैन्य उपस्थिति का लगभग पूर्ण अंत, ईरान में इस घटनाक्रम का खुलेआम जश्न और क्षेत्र में लगातार बढ़ती अस्थिरता, ये तीनों घटनाएं अलग-अलग नहीं हैं. इनके पीछे पिछले ढाई दशक की वह कहानी छिपी है, जिसमें दुनिया की सबसे शक्तिशाली महाशक्ति ने सुरक्षा, लोकतंत्र और आतंकवाद-विरोध के नाम पर ऐसे फैसले लिए, जिनके परिणाम आज भी पूरी दुनिया भुगत रही है.
11 सितंबर 2001 को अमेरिका पर हुए आतंकवादी हमले ने विश्व राजनीति की दिशा बदल दी. न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमले के बाद अमेरिका ने आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक युद्ध की घोषणा की. सबसे पहले अफगानिस्तान को निशाना बनाया गया. तर्क यह था कि वहां तालिबान शासन अल-कायदा को संरक्षण दे रहा है. लेकिन दो दशक से अधिक समय तक चले युद्ध के बाद अमेरिका को अंततः अफगानिस्तान से लौटना पड़ा और सत्ता फिर उसी तालिबान के हाथों में चली गई, जिसे हटाने के लिए यह अभियान शुरू किया गया था.
अफगानिस्तान के बाद अमेरिका का ध्यान इराक पर केंद्रित हुआ. तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज बुश प्रशासन ने दावा किया कि इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन के पास समूह विनाश के हथियार हैं, जो दुनिया के लिए खतरा बन सकते हैं. संयुक्त राष्ट्र से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक इस दावे को जोर-शोर से प्रचारित किया गया. मार्च 2003 में अमेरिकी सेना इराक में दाखिल हुई और कुछ ही समय में सद्दाम हुसैन का शासन समाप्त हो गया. लेकिन बाद में दुनिया ने देखा कि जिन घातक हथियारों के आधार पर युद्ध का औचित्य सिद्ध किया गया था, वे कभी मिले ही नहीं. युद्ध तो हुआ, शासन भी बदल गया, लेकिन वह मूल कारण ही संदिग्ध साबित हुआ जिसके नाम पर लाखों लोगों का भविष्य दांव पर लगा दिया गया था.
इराक युद्ध का हिसाब केवल राजनीतिक नहीं, मानवीय भी है. लाखों इराकी नागरिक विस्थापित हुए, हजारों सैनिक मारे गए, शहर तबाह हुए और पूरा समाज सांप्रदायिक हिंसा तथा अस्थिरता की गिरफ्त में चला गया. अमेरिका ने इस अभियान पर खरबों डॉलर खर्च किए, लेकिन 23 वर्षों की उपस्थिति के बाद भी वह एक स्थिर, सुरक्षित और आत्मनिर्भर इराक खड़ा नहीं कर सका. सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर अमेरिका ने हासिल क्या किया? यदि उद्देश्य आतंकवाद को समाप्त करना था, तो इराक युद्ध के बाद ही आईएसआईएस जैसे और भी अधिक क्रूर संगठन का उदय हुआ. यदि उद्देश्य लोकतंत्र स्थापित करना था, तो आज भी इराक की राजनीतिक व्यवस्था बाहरी प्रभावों और आंतरिक संघर्षों से जूझ रही है. यदि उद्देश्य क्षेत्रीय स्थिरता था, तो पश्चिम एशिया पहले की तुलना में कहीं अधिक अस्थिर दिखाई देता है.
विडंबना यह है कि जिस ईरान को नियंत्रित करने और सीमित रखने की रणनीति के तहत अमेरिका ने दशकों तक पश्चिम एशिया में हस्तक्षेप किया, वही ईरान आज क्षेत्रीय राजनीति का सबसे प्रभावशाली खिलाड़ी बनकर उभरा है. इराक की राजनीति से लेकर सीरिया, लेबनान और यमन तक उसका प्रभाव दिखाई देता है. अमेरिका की दीर्घकालिक सैन्य मौजूदगी भी इस वास्तविकता को बदल नहीं सकी.
यह पहली बार नहीं है जब किसी महाशक्ति ने अपने सामरिक हितों के लिए किसी क्षेत्र की राजनीतिक संरचना को बदलने का प्रयास किया हो. इतिहास में अनेक उदाहरण मिलते हैं, जहां बाहरी शक्तियों ने शासन परिवर्तन को समाधान माना, लेकिन परिणाम और अधिक अराजकता के रूप में सामने आए. पश्चिम एशिया का अनुभव भी यही बताता है कि सैन्य शक्ति से सरकारें गिराई जा सकती हैं, लेकिन स्थिर समाज नहीं बनाए जा सकते.
इराक का मामला एक और महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है. क्या किसी देश को यह अधिकार होना चाहिए कि वह अपनी शक्ति के बल पर दूसरे देशों के राजनीतिक भविष्य का निर्णय करे? यदि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में जवाबदेही केवल छोटे देशों के लिए हो और बड़ी शक्तियां उससे ऊपर खड़ी दिखाई दें, तो वैश्विक न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता कमजोर पड़ती है.
यही कारण है कि आज बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की चर्चा बढ़ रही है. इसका अर्थ किसी एक देश का विरोध नहीं, बल्कि शक्ति के संतुलन की आवश्यकता है. जब निर्णय प्रक्रिया में अनेक शक्तियां, संस्थाएं और क्षेत्रीय हित शामिल होते हैं, तब एकतरफा सैन्य अभियानों और राजनीतिक हस्तक्षेपों की संभावना कम होती है. सत्ता का संतुलन केवल देशों के बीच ही नहीं, लोकतंत्रों के भीतर भी उतना ही आवश्यक है. संसद, न्यायपालिका, मीडिया, नागरिक समाज और विपक्ष, ये सभी संस्थाएं इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे सत्ता पर नियंत्रण और जवाबदेही सुनिश्चित करती हैं. जहां संतुलन समाप्त होता है, वहां निर्णयों की समीक्षा भी समाप्त होने लगती है. और जहां समीक्षा नहीं होती, वहां गलतियां नीतियों का रूप ले लेती हैं.
पश्चिम एशिया की त्रासदी इसी सत्य की याद दिलाती है. अफगानिस्तान, इराक और लीबिया में हुए हस्तक्षेपों ने यह साबित किया कि केवल सैन्य श्रेष्ठता किसी राष्ट्र को नैतिक श्रेष्ठता नहीं देती. शक्ति जितनी बड़ी होती है, उसकी जवाबदेही भी उतनी ही बड़ी होनी चाहिए. दुर्भाग्य यह है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अक्सर शक्ति तो दिखाई देती है, जवाबदेही नहीं.
आज जब दुनिया नए भू-राजनीतिक तनावों, युद्धों और शक्ति-संघर्षों के दौर से गुजर रही है, तब सबसे बड़ा सबक यही है कि किसी भी स्तर पर निरंकुश शक्ति अंततः असंतुलन पैदा करती है. चाहे वह किसी देश की सरकार हो, कोई राजनीतिक दल हो या फिर कोई वैश्विक महाशक्ति, बिना संतुलन के शक्ति अंततः संकट को जन्म देती है. इसलिए प्रश्न केवल अमेरिका, इराक या पश्चिम एशिया का नहीं है. प्रश्न उस सिद्धांत का है जिस पर आधुनिक विश्व व्यवस्था खड़ी है. यदि मानवता को स्थिरता, शांति और न्याय चाहिए, तो शक्ति का संतुलन बनाए रखना अनिवार्य होगा. क्योंकि सत्ता का स्वभाव विस्तार करना है, लेकिन लोकतंत्र और मानवता का स्वभाव उसे सीमित करना है. और इतिहास का अनुभव यही कहता है कि जहां संतुलन समाप्त होता है, वहीं से संकट शुरू होता है.





