सोयाबीन कटाई के लिए आदिवासी मजदूरों का पलायन
2,800 रुपए प्रति एकड़ मिल रही मजदूरी

रोजगार के अभाव में परिवारों के साथ मेलघाट से मैदानी इलाकों की ओर रुख
चिखलदरा/दि.9 – मेलघाट के आदिवासी बहुल और दुर्गम क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर रोजगार के पर्याप्त अवसर उपलब्ध नहीं होने के कारण एक बार फिर मौसमी पलायन शुरू हो गया है. सोयाबीन कटाई का सीजन शुरू होते ही बड़ी संख्या में आदिवासी मजदूर अपने परिवारों के साथ रोजगार की तलाश में मैदानी और शहरी क्षेत्रों की ओर निकल रहे हैं. करीब एक महीने तक चलने वाले इस सीजन में मजदूर अधिक से अधिक काम हासिल कर आय अर्जित करने का प्रयास कर रहे हैं.
* रोजगार गारंटी की मजदूरी कम, इसलिए बाहर जाने की मजबूरी
मेलघाट में रोजगार गारंटी योजना के तहत मिलने वाली मजदूरी कम होने तथा स्थानीय स्तर पर काम के सीमित अवसरों के कारण आदिवासी मजदूर हर साल सोयाबीन कटाई के मौसम में बाहर जाते हैं. पिछले करीब पंद्रह दिनों से मेलघाट के गांवों से मजदूरों के समूह निजी वाहनों के जरिए मैदानी इलाकों की ओर जाते दिखाई दे रहे हैं. मजदूर बुलढाणा, चिखली, अकोला, पातूर, मेहकर, शेगांव, मुर्तिजापुर और दर्यापुर सहित विभिन्न क्षेत्रों में सोयाबीन कटाई का काम करने पहुंच रहे हैं. स्थानीय स्तर पर रोजगार की कमी के चलते मौसमी पलायन ही इन परिवारों के लिए आय का महत्वपूर्ण साधन बन गया है.
* 18 गांवों से मजदूरों के समूह रवाना
चिखलदरा तहसील के दहेंद्री, काटकुंभ, कोइलारी, पाचडोंगरी, चुरणी, कोटमी, तोरणवाड़ी, कामिदा, मेहरिआम, खुटीदा, बीबा, राहु, कारंज, डोमा, काजलडोह, बामादेही और बगदरी सहित कई गांवों से बड़ी संख्या में मजदूर बाहर जा रहे हैं. मजदूर परिवारों के समूह बनाकर खेतों में ठेके पर काम ले रहे हैं. इससे उन्हें एक ही क्षेत्र में लगातार कई दिनों तक काम मिलने की संभावना रहती है.
* 2,800 रुपए प्रति एकड़ का फ्लैट रेट
वर्तमान में मैदानी और शहरी क्षेत्रों में सोयाबीन कटाई के लिए करीब 2,800 रुपए प्रति एकड़ का फ्लैट रेट चल रहा है. मजदूर समूह के रूप में ठेके पर काम लेकर सामूहिक रूप से कटाई कर रहे हैं. इससे उन्हें नियमित रूप से काम मिलने की उम्मीद है. वहीं, स्थानीय मजदूरों द्वारा 3,200 रुपए प्रति एकड़ तक मजदूरी की मांग किए जाने के कारण किसान भी अपेक्षाकृत कम दर पर उपलब्ध मेलघाट के मजदूरों को प्राथमिकता दे रहे हैं.
* ‘जहां काम मिलता है, वहीं जाना पड़ता है’
मेलघाट के मजदूर रयाबा धुर्वे ने बताया कि रोजगार गारंटी योजना के तहत मिलने वाली मजदूरी कम है. फसल कटाई के मौसम में करीब एक महीने तक सोयाबीन सहित विभिन्न फसलों के काम मिलते हैं. इसलिए जहां भी रोजगार मिलता है, मजदूर वहां जाने को मजबूर होते हैं.
* किसानों पर भी सूखे की मार
दूसरी ओर, किसानों की आर्थिक स्थिति भी चुनौतीपूर्ण बनी हुई है. पिछले सूखे और अनियमित बारिश के कारण फसलों को नुकसान हुआ है. ऐसे में बची हुई सोयाबीन फसल की कटाई के लिए मजदूरी देना किसानों के लिए अतिरिक्त आर्थिक बोझ बन रहा है. एक तरफ किसान कम उत्पादन और बढ़ते खर्च से परेशान हैं, तो दूसरी ओर आदिवासी मजदूरों को अपने गांवों में पर्याप्त रोजगार नहीं मिल रहा है. सोयाबीन कटाई का मौजूदा सीजन दोनों वर्गों की आर्थिक परेशानियों को सामने ला रहा है.
* दशहरे तक जारी रहेगा पलायन
सोयाबीन कटाई का काम आगामी 15 से 20 दिनों तक अथवा दशहरे तक चलने की संभावना है. इस अवधि में मेलघाट से गए मजदूर जिले के मैदानी क्षेत्रों में रहकर खेतों में कटाई का काम करेंगे. सीजन समाप्त होने के बाद उनके वापस गांव लौटने की संभावना है. हर साल फसल कटाई के मौसम में होने वाला यह मौसमी पलायन मेलघाट के आदिवासी परिवारों के लिए रोजगार और आय का एक प्रमुख जरिया बना हुआ है.





