‘सायलेंट हार्ट अटैक’ का खतरा बढ़ा, अब युवा भी चपेट में

नाना पाटेकर के निधन के बाद हृदय रोग को लेकर चिंता

30 से 40 वर्ष के लोगों में भी सामने आ रहे मामले

अमरावती /दि.9– अभिनेता नाना पाटेकर के हृदयाघात से निधन के बाद एक बार फिर ‘सायलेंट हार्ट अटैक’ को लेकर चिंता बढ़ गई है. हृदयाघात का खतरा अब केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कम उम्र के लोग भी इसकी चपेट में आ रहे हैं. 30 से 40 वर्ष की आयु के लोगों में भी हृदयाघात के मामले सामने आना चिंता का विषय है. विशेष रूप से बिना स्पष्ट लक्षणों के होने वाला हृदयाघात जानलेवा साबित हो सकता है.
* बदलती जीवनशैली भी प्रमुख कारण
बदलती जीवनशैली, मानसिक तनाव, शारीरिक गतिविधियों की कमी, असंतुलित खानपान और पर्याप्त नींद न लेना हृदय रोग के प्रमुख जोखिम कारक हैं. इसके अलावा मधुमेह, उच्च रक्तचाप, बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल और मोटापा भी हृदयाघात की आशंका बढ़ाते हैं. धूम्रपान तथा परिवार में हृदय रोग का इतिहास होने पर भी अतिरिक्त सावधानी जरूरी है.
* क्या है सायलेंट हार्ट अटैक?
हृदयाघात के दौरान हर व्यक्ति को सीने में तेज दर्द हो, यह जरूरी नहीं है. कुछ लोगों में सांस फूलना, अचानक पसीना आना, असामान्य थकान, मितली या सीने में हल्की बेचैनी जैसे लक्षण दिखाई देते हैं. कई बार लक्षण मामूली होने के कारण व्यक्ति उन्हें सामान्य परेशानी समझकर नजरअंदाज कर देता है. यही लापरवाही गंभीर साबित हो सकती है.
* युवाओं को भी नियमित जांच की जरूरत
18 से 45 वर्ष की आयु के लोगों में भी हृदय रोग के जोखिम को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. कम उम्र में किसी तरह की परेशानी महसूस नहीं होने का अर्थ यह नहीं है कि हृदय पूरी तरह स्वस्थ है. रक्तचाप, रक्त में शर्करा और कोलेस्ट्रॉल की नियमित जांच के साथ संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद और तनाव पर नियंत्रण जरूरी है.
* लक्षण दिखें तो तत्काल लें चिकित्सा सहायता
सीने में दर्द या दबाव, सांस लेने में परेशानी अथवा अचानक ठंडा पसीना आने जैसे लक्षण दिखाई देने पर तत्काल आपातकालीन चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए. मरीज को स्वयं वाहन चलाकर अस्पताल नहीं जाना चाहिए. यदि कोई व्यक्ति बेहोश हो जाए और सामान्य रूप से सांस न ले रहा हो, तो आपातकालीन सहायता बुलाकर प्रशिक्षित व्यक्ति को सीपीआर शुरू करना चाहिए. हृदयाघात के लक्षणों को मामूली समझकर टालना खतरनाक हो सकता है. समय पर पहचान, जांच और उपचार से गंभीर परिणामों का जोखिम कम करने में मदद मिल सकती है.

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