महंगाई पर शिकंजा, विकास की भी परीक्षा

महंगाई पर नियंत्रण और रुपये की गिरावट थामने के उद्देश्य से भारतीय रिजर्व बैंक ने प्रमुख नीतिगत ब्याज दर यानी रेपो रेट में 0.25 प्रतिशत की वृद्धि कर इसे 5.50 प्रतिशत कर दिया है. करीब साढ़े तीन साल बाद रेपो रेट में की गई यह बढ़ोतरी मौद्रिक नीति में महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत है. रिजर्व बैंक के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती महंगाई पर लगाम लगाने के साथ आर्थिक विकास की गति बनाए रखने की है. ब्याज दरों में वृद्धि इसी संतुलन को साधने का प्रयास है, लेकिन इसकी सफलता का आकलन केवल महंगाई के आंकड़ों से नहीं, बल्कि आम नागरिकों पर पड़ने वाले प्रभाव से भी करना होगा.
रिजर्व बैंक के अनुसार, खाद्य पदार्थों और ईंधन की बढ़ती कीमतें, कमजोर मानसून, अल नीनो की आशंका तथा अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की महंगाई ने आर्थिक चिंताएं बढ़ाई हैं. पश्चिम एशिया का संघर्ष और वैश्विक व्यापार में अनिश्चितता भी स्थिति को जटिल बना रहे हैं. ऐसी परिस्थितियों में महंगाई को अनियंत्रित छोड़ना अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदेह हो सकता है. कीमतों में लगातार वृद्धि से आम परिवारों का बजट बिगड़ता है और उनकी क्रयशक्ति कमजोर होती है. इसलिए रिजर्व बैंक के लिए समय रहते कदम उठाना जरूरी है.
हालांकि, ब्याज दरों में वृद्धि का दूसरा पहलू भी है. रेपो रेट बढ़ने से बैंकों के लिए कर्ज महंगा हो सकता है, जिसका असर आवास, वाहन और कारोबार के ऋण पर पड़ता है. इससे लोगों की खरीदारी की क्षमता घट सकती है और कंपनियां नए निवेश को टाल सकती हैं. परिणामस्वरूप मांग, उत्पादन और रोजगार सृजन पर दबाव पड़ने की आशंका रहती है. महंगाई रोकने की कोशिश में यदि आर्थिक गतिविधियां धीमी पड़ती हैं, तो इसका बोझ अंततः उपभोक्ताओं और छोटे कारोबारियों को उठाना पड़ सकता है.
दूसरी ओर, रिजर्व बैंक ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए आर्थिक विकास दर का अनुमान बढ़ाकर 7.1 प्रतिशत किया है. यह भरोसा अर्थव्यवस्था की मजबूती का संकेत देता है. लेकिन विकास दर का अनुमान तभी सार्थक होगा, जब उसका लाभ रोजगार, आय और आम लोगों की जीवन-स्थितियों में भी दिखाई दे. रेपो रेट में बढ़ोतरी अपने आप में महंगाई का स्थायी समाधान नहीं है. खाद्य पदार्थों की आपूर्ति बढ़ाने, जमाखोरी रोकने, कृषि उत्पादन को मौसम के जोखिम से बचाने और ईंधन की कीमतों के प्रभाव को सीमित करने के लिए सरकार को भी प्रभावी कदम उठाने होंगे. रिजर्व बैंक को आगे की दर संबंधी नीतियों में सावधानी बरतनी होगी. अंततः उसकी नीति की असली परीक्षा यही है कि महंगाई नियंत्रित हो, रुपये पर दबाव घटे और आर्थिक विकास की गति भी बनी रहे. आम उपभोक्ता के हितों की रक्षा किए बिना महंगाई पर शिकंजा कसने का उद्देश्य अधूरा ही रहेगा.

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