भीषण अग्निकांड के बाद भी नहीं सुधरा डफरीन अस्पताल प्रबंधन
भाजपा महिला प्रदेशाध्यक्ष चित्रा वाघ के दौरे के दौरान खुली व्यवस्था की पोल

* मरीजों के प्रति असंवेदनशीलता के दो गंभीर मामले सामने आए
* एम्बुलेंस उपलब्ध होने के बावजूद डीजल और चालक का अभाव
* फटकार पडने के बाद आनन-फानन में दो वाहनों की व्यवस्था
अमरावती/दि.29 – जिला महिला अस्पताल (डफरीन) में तीन नवजात शिशुओं की जान लेने वाले भीषण अग्निकांड के बाद अस्पताल की व्यवस्थाओं को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं. हादसे के बाद भी अस्पताल प्रबंधन की कार्यप्रणाली में अपेक्षित सुधार नहीं होने का एक और गंभीर मामला शनिवार को सामने आया. मरीजों के लिए एम्बुलेंस जैसी बुनियादी सुविधा उपलब्ध कराने में भी अस्पताल प्रशासन की लापरवाही उजागर हुई.
बता दे कि, भाजपा की महिला प्रदेशाध्यक्ष चित्रा वाघ आज डफरीन अस्पताल के दौरे पर पहुंचीं, उसी दौरान अस्पताल परिसर में दो नवप्रसूता महिलाएं अपने परिजनों के साथ एम्बुलेंस या अन्य वाहन का इंतजार करती हुई दिखाई दीं. वाघ ने जब दोनों महिलाओं और उनके परिजनों से बातचीत की तो अस्पताल प्रबंधन की बदहाल व्यवस्था सामने आ गई. इस समय राज्यसभा सांसद डॉ. अनिल बोंडे, भाजपा के ग्रामीण जिलाध्यक्ष व विधायक प्रताप अडसड, महापौर श्रीचंद तेजवानी, मनपा के सभागृह नेता चेतन गावंडे, भाजपा शहराध्यक्ष डॉ. नितीन धांडे, प्रदेश प्रवक्ता शिवराय कुलकर्णी, जिला उपाध्यक्ष नितीन गुडधे पाटिल, महिला प्रदेश उपाध्यक्ष आरती राजेश वानखडे, महिला शहराध्यक्ष सुधा तिवारी व प्रीती वाठ आदी सहित भाजपा के अनेकों पदाधिकारी उपस्थित थे.
* अस्पताल परिसर में खड़ी थीं दो एम्बुलेंस, फिर भी मरीजों को नहीं मिली सुविधा
सबसे गंभीर बात यह सामने आई कि अस्पताल परिसर में दो एम्बुलेंस वाहन उपलब्ध होने के बावजूद उनका उपयोग मरीजों को घर पहुंचाने या रेफर किए गए मरीजों को दूसरे अस्पताल ले जाने के लिए नहीं किया जा रहा था. बताया गया कि वाहनों में डीजल और चालक उपलब्ध नहीं होने के कारण वे खड़े थे. एक ओर अस्पताल में गर्भवती और नवप्रसूता महिलाओं को समय पर परिवहन सुविधा नहीं मिल रही थी, वहीं दूसरी ओर एम्बुलेंस वाहन परिसर में खड़े रहने की स्थिति ने अस्पताल प्रबंधन की कार्यक्षमता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
* नवजात बच्चे के साथ बरामदे में बैठी थी रीना उईके
भाजपा की महिला प्रदेशाध्यक्ष चित्रा वाघ को अस्पताल के बरामदे में माहुली जहांगीर निवासी रीना उईके अपने नवजात बच्चे और सास के साथ बैठी दिखाई दीं. पूछताछ करने पर पता चला कि प्रसव के बाद छुट्टी मिलने के बावजूद रीना को अपने गांव लौटने के लिए एम्बुलेंस की व्यवस्था नहीं मिल पाई थी. नवजात बच्चे को लेकर अस्पताल से बाहर जाने की तैयारी में परिवार वाहन की प्रतीक्षा कर रहा था. काफी समय बीतने के बावजूद परिवहन की व्यवस्था नहीं होने से महिला और उसके परिजनों को अस्पताल परिसर में ही बैठना पड़ा. यह स्थिति देखकर वाघ ने अस्पताल प्रशासन से तत्काल जवाब मांगा. नवजात बच्चे के साथ एक महिला को इस तरह वाहन के लिए इंतजार करना पड़ रहा है और अस्पताल परिसर में उपलब्ध एम्बुलेंस का उपयोग नहीं हो पा रहा है, इस पर उन्होंने नाराजगी जताई.
* नागपुर रेफर महिला के लिए भी एम्बुलेंस नहीं
इसी दौरान दूसरा मामला भी सामने आया. नांदगांव खंडेश्वर तहसील के पोदोरी गांव निवासी 28 वर्षीय रोशनी हरीश शिंगणे को डफरीन अस्पताल से नागपुर रेफर किया गया था. गंभीर चिकित्सा आवश्यकता के चलते उसे उच्चस्तरीय उपचार के लिए भेजने का निर्णय लिया गया, लेकिन उसके लिए भी एम्बुलेंस की व्यवस्था नहीं की गई थी. रेफर किए जाने के बाद मरीज और उसके परिजन परिवहन सुविधा की प्रतीक्षा कर रहे थे. ऐसे में सवाल उठता है कि जिस मरीज को चिकित्सकीय रूप से तत्काल दूसरे अस्पताल ले जाने की आवश्यकता है, उसके लिए समय पर एम्बुलेंस क्यों उपलब्ध नहीं कराई गई?
* चित्रा वाघ ने सीएस को मौके पर तलब किया
दोनों मामलों की जानकारी मिलते ही चित्रा वाघ ने तत्काल जिला शल्यचिकित्सक डॉ. विनोद पवार को मौके पर बुलाया. उन्होंने अस्पताल प्रशासन और संबंधित अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाते हुए मरीजों को बुनियादी सुविधाओं के लिए परेशान किए जाने पर नाराजगी व्यक्त की. चित्रा वाघ ने स्पष्ट रूप से सवाल उठाया कि यदि अस्पताल में एम्बुलेंस वाहन उपलब्ध हैं, तो केवल डीजल और चालक के अभाव में मरीजों को सुविधा से वंचित क्यों रखा जा रहा है. विशेष रूप से नवजात बच्चे के साथ महिला तथा रेफर किए गए मरीज को इस तरह इंतजार करने की नौबत क्यों आई, इसका जवाब अस्पताल प्रशासन को देना चाहिए.
* फटकार के बाद तत्काल दो वाहनों की व्यवस्था
भाजपा नेत्री चित्रा वाघ की फटकार के बाद अस्पताल प्रबंधन हरकत में आया और दोनों मामलों के लिए तत्काल वाहनों की व्यवस्था की गई. एक वाहन से रीना उईके को नवजात बच्चे और परिजनों के साथ माहुली जहांगीर रवाना किया गया. वहीं दूसरी ओर रोशनी शिंगणे को अमरावती स्थित पीडीएमसी अस्पताल में रेफर किया गया. हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम ने डफरीन अस्पताल की व्यवस्थाओं पर एक बार फिर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है.
* अग्निकांड के बाद भी सवाल जस के तस
डफरीन अस्पताल में कुछ ही दिन पहले एसएनसीयू में आग लगने से तीन नवजात बच्चों की मौत हुई थी. इस घटना के बाद अस्पताल की सुरक्षा व्यवस्था, फायर सिस्टम, विद्युत व्यवस्था, प्रशासनिक निगरानी और मरीजों की सुविधाओं को लेकर राज्य स्तर पर जांच शुरू है. उच्चस्तरीय समिति घटनास्थल का निरीक्षण कर चुकी है और संबंधित अधिकारियों एवं कर्मचारियों के बयान भी दर्ज किए जा रहे हैं. ऐसे संवेदनशील समय में अस्पताल प्रबंधन से अपेक्षा थी कि वह अपनी कार्यप्रणाली में तत्काल सुधार करेगा और मरीजों की सुरक्षा तथा सुविधाओं को सर्वोच्च प्राथमिकता देगा. लेकिन एम्बुलेंस जैसी बुनियादी सुविधा के लिए भी मरीजों को इंतजार करना पड़ना यह बताता है कि हादसे के बाद भी व्यवस्था में अपेक्षित संवेदनशीलता नहीं आई है.
* अब सवाल-जवाबदेही किसकी?
डफरीन में लगातार सामने आ रही खामियों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि अस्पताल में उपलब्ध संसाधनों का संचालन और निगरानी आखिर कौन करता है? यदि दो एम्बुलेंस वाहन उपलब्ध हैं तो उनमें समय पर डीजल की व्यवस्था क्यों नहीं की गई? चालक उपलब्ध नहीं है तो वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं की गई? और सबसे महत्वपूर्ण, रेफर किए गए मरीजों के लिए परिवहन सुविधा सुनिश्चित करना अस्पताल प्रशासन की जिम्मेदारी होने के बावजूद मरीजों को निजी स्तर पर वाहन तलाशने की नौबत क्यों आई?
उल्लेखनीय है कि, तीन नवजातों की मौत के बाद डफरीन अस्पताल पहले ही पूरे राज्य में चर्चा के केंद्र में है. ऐसे में मरीजों और उनके परिजनों को छोटी-छोटी बुनियादी सुविधाओं के लिए भी परेशान होना व्यवस्था की गंभीर कमजोरी को दर्शाता है.





