लोकपर्व भुजरिया है वैज्ञानिक दृष्टिकोण का प्रतीक

आज भुजरिया पर्व पर विशेष

भारत कृषि प्रधान देश है. वैश्विक शहरीकरण के बाद भी देश की बहुसंख्यक जनसंख्या आज भी गाँव-देहात में निवास और कृषि कार्य करती है. हमारे देश में धार्मिक त्यौहार और उत्सव के साथ बहुत से उत्सव लोकपरंपरा, स्थान की भौगोलिक स्थिति और इतिहास से भी जुड़े हुए हैं. यह सभी धार्मिक और लोकपरंपरा के त्यौहार और उत्सव केवल आपसी मेलजोल के लिए ही नहीं थे. इनके पीछे प्रकृति के पूजन और संरक्षण-संवर्धन की उदात्त मानवीय संवेदनाओं और मूल्यों का होना है.
इसी तरह का एक लोकपर्व भुजरिया (कजरिया) उत्तर और मध्य भारत और उसके सीमाक्षेत्र के हिस्सों में मनाया जाता है. रक्षाबंधन के दूसरे दिन मनाए जाने वाले इस उत्सव का प्रारंभ नागपंचमी के दूसरे दिन बांस के टोकरियों में मिट्टी भरकर बीज बोने से होती है और श्रावणी पूर्णिमा रक्षाबंधन के दूसरे दिन इन पौधों को किसी जलाशय पर धोकर और घर-परिवार, आस-पड़ोस और रिश्तेदारों को लेकर आशीर्वाद लिया जाता है.
भुजरिया केवल उत्सव का पर्व नहीं है उसके पीछे कृषि की भरपूर उपज का विज्ञान है. आजकल तो अन्न के बीज को सुरक्षित रखने तथा उसके परीक्षण के अनेक तरीके विकसित हो गए हैं किन्तु प्राचीन काल से भारत में अगले एक वर्ष तक बीज को सुरक्षित रखने के अपने तरीके थे. पहले घरों में भिन्न-भिन्न प्रकार की मिट्टी की कोठियाँ बनती थी, जिसमे नीम आदि की पत्तियाँ मिलाकर उसे वायुरोधक बनाकर अलग-अलग कोठियों में बीज रखा जाता था. इसके साथ ही उस सुरक्षित बीज का समय-समय पर परीक्षण भी किया जाता था. बीज के परिक्षण भी अलग-अलग समय पर अलग-अलग तरीके से किया जाता था. भारतीय नववर्ष के पहले मास चैत्र में जब बीज रखा जाता था तो अच्छा बीज किस खेत का है, उसी खेत की मिट्टी लाकर उसे घर में चैत्र नवरात्रि में देवस्थान पर लाकर उगाया जाता था जिसे हम जवारे या जुआरे कहते हैं. जिस खेत का अन्न अच्छा उगता था, उसमें से बीज के लिए तिगुना रख लिया जाता था, शेष अन्न वर्षभर परिवार के भरण-पोषण के लिए रख लिया जाता था, ज्यादा होने पर बाजार में बेच दिया जाता था.
बीज का दूसरा परीक्षण सावन मास में किया जाता था, कोठियों से अन्न निकालकर यह जांँच की जाती थी कि कहीं बीज में घुन तो नहीं लगा, उसे सावन शुक्ल छटी से नवमी के बीच खेत से महुए के पत्तों और बाँस की टोकरी में मिट्टी लाकर पुनः बोया जाता था इसे भुजलिया/कजलिया के नाम से जाना जाता है. भाद्र कृष्ण प्रतिपदा (आज के दिन) को इन भुजलियों की शोभायात्रा धूमधाम से निकाली जाती थी. हर किसान एक-दूसरे का बीज कैसा उगा यह देख भी ले इसलिए नदी-सरोवर आदि में जवारे/जुआरे धोकर उसे एक-दूसरे को भेंट दिया जाता था. लोग इसी समय बीज की अदला-बदली भी कर लेते थे.
बीज का तीसरा परीक्षण बुआई के ठीक पहले शारदीय नवरात्रि में देवी जी के यहाँ सार्वजनिक रूप से जुआरा लगाने की परम्परा सदियों से है. पुनः जिस खेत में बुआई करना है उसकी मिट्टी लाकर मिट्टी के पात्र में अन्न उगाया जाता है. जिस कोठी का सबसे अच्छा उगता उसे खेतों में बोया जानेवाले बीज के लिए तथा बाकी को अगले चार माह भोजन के रूप में उपयोग हो जाता था.
वैज्ञानिक परिक्षणों से आज यह सिद्ध हो चुका है कि यह जुआरे जानलेवा बीमारी कैंसर रोधी है. हमारे यहाँ तो सदियों से जुआरे का रस पीने की परम्परा है. हरे जवारे का ताजा रस रक्त का शुद्धिकरण करता और शरीर में उत्पन्न बीमारियों को नष्ट करता है. भुजरिया पर्व पर नदियों-सरोवरों में जुआरे को धोने के बाद उसमें से आधे जुआरे को गाँव के मन्दिर में चढ़ा दिया जाता था, मन्दिर का पुजारी उसे बाँटकर, उसका रस निकालकर संध्या आरती में भगवान के चरणामृत के रूप में सबको बाँटता था.
बीज बचाने की इस अद्भुत प्रयोगशाला को हमारे पूर्वजों ने धर्म के साथ जोड़कर उसे त्यौहार का रूप दे दिया. जिसे हम आज भी धूमधाम से मनाते आ रहे हैं. भुजलिया के इस पर्व को कुछ विद्वान भू-जल के संरक्षण से भी जोड़कर देखते हैं. आज बाजार में उपलब्ध बीज और शहरीकरण से लोग अपने पूर्वजों के इस पारंपरिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण को भूल गए हैं लेकिन यह पर्व कम प्रमाण में ही सही आज भी गाँव-देहात के साथ शहरों में भी मनाया जाता है क्योंकि लोकपरंपरा और पर्व-त्योहार-उत्सव से सनातन हिंदू धर्म का गहरा जुड़ाव है और यही हमारी जीवनशैली है जो विश्व में हमको सबसे अलग, विशिष्ट और अनूठा स्थान प्रदान करती है.
हमारे विदर्भ और अमरावती महानगर के कई स्थानों पर आज भी पारिवारिक और सार्वजनिक रूप से प्रकृति में हरियाली विस्तार के वैज्ञानिक पर्व भुजलिया को उत्साह से मनाया जाता है. आज से पच्चीस-तीस वर्ष पहले तक हमारे फ्रेजरपुरा में एकमात्र इमली के पेड़ के सावन के लिए बांधे हुए झूले के पास इकठ्ठा होकर बैंड-बाजे के साथ भुजरिया की यात्रा निकाली जाती थी. महिलाएं सोलह शृंगार कर अपने सिर पर टोकरियों को रखकर इसे धोने के लिए जलाशय तक जाती थी फिर इसे एक-दूसरे को देकर आशीर्वाद लिया जाता था. मैं इस बात का साक्षी हूँ.
– पवन नयन जायसवाल
किशोर नगर, अमरावती
मो. नं. 9421788630

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