माता-पिता अलग हो सकते हैं, लेकिन जिम्मेदारी नहीं

नागपुर हाईकोर्ट का अहम फैसला

* दो नाबालिग बेटियों के लिए 20 हजार रुपये मासिक गुजारा भत्ता बरकरार
* बच्चों का पालन-पोषण माता-पिता की कानूनी ही नहीं, नैतिक जिम्मेदारी भी
नागपुर /दि.17- मुंबई उच्च न्यायालय की नागपुर खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि माता-पिता आपसी मतभेद के कारण अलग हो सकते हैं, लेकिन बच्चों के प्रति उनकी जिम्मेदारी कभी समाप्त नहीं होती. न्यायमूर्ति महेंद्र नेरलीकर ने कहा कि बच्चों का पालन-पोषण केवल कानूनी दायित्व नहीं, बल्कि माता-पिता दोनों की नैतिक और मानवीय जिम्मेदारी भी है.
यह टिप्पणी उस मामले में की गई, जिसमें अकोला फैमिली कोर्ट ने दो नाबालिग बेटियों के भरण-पोषण के लिए पिता को प्रतिमाह 20 हजार रुपये गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था. पिता ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी, लेकिन अदालत ने उनकी याचिका खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के फैसले को सही ठहराया. अदालत ने कहा कि पति-पत्नी के बीच रिश्ते बिगड़ सकते हैं, लेकिन इसका सबसे अधिक असर मासूम बच्चों पर पड़ता है. ऐसे में बच्चों के सम्मान, सुरक्षा और भविष्य की रक्षा करना ही गुजारा भत्ता कानून का मूल उद्देश्य है. इसलिए पिता अपनी जिम्मेदारी से पूरी तरह पल्ला नहीं झाड़ सकते. हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि वर्तमान महंगाई के दौर में दो बच्चों के लिए 20 हजार रुपये प्रतिमाह का गुजारा भत्ता किसी भी दृष्टि से अधिक नहीं माना जा सकता. मामले में पिता बुलढाणा और मां अकोला की निवासी हैं तथा दोनों पुलिस विभाग में हेड कांस्टेबल के पद पर कार्यरत हैं. पारिवारिक विवाद के कारण दोनों अलग रह रहे हैं. उनकी 15 और 5 वर्ष की दो बेटियां हैं. हाईकोर्ट के इस फैसले को अलग रह रहे माता-पिता की जिम्मेदारियों को लेकर एक महत्वपूर्ण न्यायिक संदेश माना जा रहा है.

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