मराठों के 58 लाख रिकॉर्ड मिलने के दावे पर नया विवाद
ओबीसी महासंघ के अध्यक्ष बबनराव तायवाडे बोले- 37 लाख रिकॉर्ड पहले से मौजूद थे, उनका मनोज जरांगे आंदोलन से कोई संबंध नहीं

नागपुर/दि.12 – महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण और ओबीसी प्रमाणपत्रों को लेकर एक बार फिर सियासी और सामाजिक बहस तेज हो गई है. इसी बीच राष्ट्रीय ओबीसी महासंघ के अध्यक्ष बबनराव तायवाडे ने शिंदे समिति द्वारा खोजे गए रिकॉर्ड को लेकर महत्वपूर्ण दावा करते हुए कहा है कि समिति को मिले 58 लाख से अधिक रिकॉर्ड में से लगभग 37 लाख रिकॉर्ड पहले से ही सरकारी अभिलेखों में मौजूद थे और उनका मनोज जरांगे पाटिल के आंदोलन से कोई संबंध नहीं है.
तायवाडे ने कहा कि तत्कालीन मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली सरकार ने मराठा आरक्षण से संबंधित कुनबी, कुनबी-मराठा और मराठा-कुनबी रिकॉर्ड खोजने के लिए न्यायमूर्ति शिंदे समिति का गठन किया था. समिति को अब तक कुल 58 लाख 90 हजार 155 रिकॉर्ड मिले हैं. हालांकि इनमें से 37 लाख 47 हजार 142 रिकॉर्ड वर्ष 1986 से 2023 के बीच के पुराने रिकॉर्ड हैं, जिनके आधार पर संबंधित लोगों को पहले ही ओबीसी प्रमाणपत्र मिल चुके हैं. बबनराव तायवाडे के अनुसार, मनोज जरांगे पाटिल के आंदोलन के बाद मराठवाड़ा क्षेत्र में न्यायमूर्ति शिंदे समिति को 49 हजार 358 नए रिकॉर्ड मिले. इनमें से 20 हजार 143 लोगों ने जाति वैधता प्रमाणपत्र के लिए आवेदन किया, जबकि 15 हजार 597 लोगों को कुनबी के रूप में ओबीसी प्रमाणपत्र प्राप्त हुआ. तायवाडे ने कहा कि यदि किसी उपलब्धि को आंदोलन का परिणाम माना जाए, तो यही वास्तविक आंकड़ा है और इसे ही मनोज जरांगे के आंदोलन की सफलता कहा जा सकता है.
ओबीसी महासंघ ने सरकार के आंकड़ों का हवाला देते हुए एक बड़ा सवाल भी उठाया है. तायवाडे ने कहा कि शिंदे समिति की प्रक्रिया के बाद 3 लाख 11 हजार 287 लोगों को कुनबी, मराठा-कुनबी या कुनबी-मराठा जाति प्रमाणपत्र जारी किए गए, लेकिन इनमें से 2 लाख 91 हजार 144 लोगों ने जाति वैधता प्रमाणपत्र के लिए आवेदन ही नहीं किया. उन्होंने पूछा कि यदि प्रमाणपत्र वैध और आवश्यक थे, तो इतनी बड़ी संख्या में लोगों ने वैधता प्रमाणपत्र प्राप्त करने की प्रक्रिया पूरी क्यों नहीं की? तायवाडे ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय ओबीसी महासंघ उन सभी लोगों का स्वागत करता है जिनके पास वास्तविक कुनबी रिकॉर्ड और वैध दस्तावेज हैं तथा जिन्हें कानून के तहत ओबीसी प्रमाणपत्र प्राप्त हुआ है. लेकिन यदि किसी ने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर जाति प्रमाणपत्र या जाति वैधता प्रमाणपत्र हासिल करने का प्रयास किया है, तो उसका महासंघ कड़ा विरोध करेगा. उन्होंने कहा कि वास्तविक दस्तावेज रखने वाले किसी भी व्यक्ति के अधिकारों का महासंघ समर्थन करता है, लेकिन फर्जीवाड़े के जरिए आरक्षण का लाभ लेने की कोशिश किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं की जाएगी.
तायवाडे के इस बयान के बाद मराठा आरक्षण, कुनबी रिकॉर्ड और जाति प्रमाणपत्रों को लेकर चल रही बहस को नया आयाम मिल गया है. अब इस मुद्दे पर सरकार और मराठा आंदोलन की ओर से क्या प्रतिक्रिया आती है, इस पर सबकी नजरें टिकी हैं.





