स्कॉटलैंड में स्थापित हुई महर्षि सुश्रुत की प्रतिमा
भारत की प्राचीन चिकित्सा परंपरा को वैश्विक सम्मान

* रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स ऑफ एडिनबर्ग में कांस्य प्रतिमा का अनावरण
* समारोह में भारत-स्कॉटलैंड के ऐतिहासिक चिकित्सा संबंधों को किया गया याद
एडिनबर्ग/दि. 3 – भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा और चिकित्सा विज्ञान को अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक और बड़ी पहचान मिली है. स्कॉटलैंड के प्रतिष्ठित रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स ऑफ एडिनबर्ग में शल्य चिकित्सा के जनक माने जाने वाले महर्षि सुश्रुत की कांस्य प्रतिमा का भव्य अनावरण भारत के महावाणिज्यदूत द्वारा किया गया. 22 जून को आयोजित इस विशेष समारोह में चिकित्सा जगत, शिक्षाविदों और भारतीय समुदाय के प्रतिनिधियों ने भाग लिया तथा भारत की हजारों वर्ष पुरानी चिकित्सा विरासत को सम्मानपूर्वक स्मरण किया. समारोह के दौरान वक्ताओं ने कहा कि महर्षि सुश्रुत का योगदान केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्होंने विश्व चिकित्सा विज्ञान, विशेषकर शल्य चिकित्सा के विकास की मजबूत नींव रखी.
कार्यक्रम में भारत और स्कॉटलैंड के बीच चिकित्सा एवं शल्य चिकित्सा के ऐतिहासिक संबंधों तथा रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स ऑफ एडिनबर्ग की वैश्विक स्तर पर सर्जिकल शिक्षा और अनुसंधान में महत्वपूर्ण भूमिका को भी रेखांकित किया गया. भारतीय महावाणिज्य दूतावास ने इस पहल के लिए रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स ऑफ एडिनबर्ग तथा वरिष्ठ सर्जन प्रोफेसर चंद्रा चेरुवु का विशेष आभार व्यक्त किया. दूतावास ने इसे भारत की प्राचीन वैज्ञानिक एवं चिकित्सा उपलब्धियों को वैश्विक स्तर पर सम्मान दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया.
बता दें कि महर्षि सुश्रुत को विश्वभर में शल्य चिकित्सा का अग्रदूत माना जाता है. लगभग 2500 वर्ष पूर्व रचित उनकी प्रसिद्ध कृति ’सुश्रुत संहिता’ चिकित्सा विज्ञान का एक अद्वितीय ग्रंथ है. इसमें 300 से अधिक शल्य प्रक्रियाओं, 120 से अधिक शल्य उपकरणों, शरीर रचना विज्ञान, अस्थि रोग, नेत्र चिकित्सा, प्रसूति, आघात उपचार तथा पुनर्निर्माण (प्लास्टिक) सर्जरी सहित अनेक विषयों का विस्तृत वर्णन मिलता है. आधुनिक प्लास्टिक सर्जरी के कई सिद्धांतों की जड़ें भी सुश्रुत के कार्यों में देखी जाती हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि एडिनबर्ग जैसे विश्वविख्यात चिकित्सा संस्थान में महर्षि सुश्रुत की प्रतिमा स्थापित होना केवल एक औपचारिक सम्मान नहीं, बल्कि इस बात की वैश्विक स्वीकारोक्ति है कि प्राचीन भारत ने चिकित्सा विज्ञान के विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान दिया था. यह पहल आने वाली पीढ़ियों को भारतीय ज्ञान परंपरा से परिचित कराने और भारत की वैज्ञानिक विरासत के प्रति सम्मान बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी.
इस अवसर पर भारतीय समुदाय के सदस्यों ने भी इसे गर्व का क्षण बताया और कहा कि महर्षि सुश्रुत की प्रतिमा भारत की समृद्ध चिकित्सा परंपरा, वैज्ञानिक सोच और विश्व कल्याण की भावना का स्थायी प्रतीक बनेगी. यह आयोजन भारत और स्कॉटलैंड के बीच शिक्षा, चिकित्सा और सांस्कृतिक सहयोग को नई ऊर्जा प्रदान करने वाला माना जा रहा है.





