विद्यार्थी घटे, हिंदी पत्रकारिता पाठ्यक्रम बंद, फिर 82 करोड़ का परिसर किसलिए?
अनुभवी प्राध्यापकों को हटाने और मनमाने कामकाज के आरोपों से अमरावती का आईआईएमसी विवादों में

अमरावती/दि.20– पत्रकारिता और जनसंचार के क्षेत्र में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से केंद्र सरकार की भारतीय जनसंचार संस्थान का अमरावती में स्वतंत्र शैक्षणिक परिसर तैयार किया जा रहा है. बडनेरा क्षेत्र में करीब 15 एकड़ जमीन पर लगभग 82 करोड़ रुपये की लागत से यह महत्वाकांक्षी परियोजना आकार ले रही है. एक ओर अत्याधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित भव्य परिसर का निर्माण किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर वर्तमान केंद्र में लगातार घटती विद्यार्थी संख्या, हिंदी पत्रकारिता पाठ्यक्रम में शून्य प्रवेश, अध्यापन की गुणवत्ता तथा मनुष्यबल की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं. ऐसे में करोड़ों रुपये खर्च कर तैयार किए जा रहे इस परिसर के भविष्य में ‘सफेद हाथी’ साबित होने की आशंका व्यक्त की जा रही है.
* 90 सीटों की क्षमता, पढ़ रहे केवल 18 विद्यार्थी
वर्तमान में आईआईएमसी का अमरावती केंद्र संत गाडगे बाबा अमरावती विश्वविद्यालय परिसर से संचालित हो रहा है. इस वर्ष की प्रवेश स्थिति संस्थान के लिए चिंता का विषय बनी हुई है. हिंदी पत्रकारिता पाठ्यक्रम में एक भी विद्यार्थी ने प्रवेश नहीं लिया, जिसके कारण यह पाठ्यक्रम इस वर्ष बंद हो गया है.वहीं अंग्रेजी पत्रकारिता पाठ्यक्रम में 30 विद्यार्थियों की क्षमता के मुकाबले केवल 8 विद्यार्थियों ने प्रवेश लिया है. मराठी पत्रकारिता पाठ्यक्रम की भी 30 सीटें हैं, लेकिन इसमें सिर्फ 10 विद्यार्थी दाखिल हुए हैं. इस तरह तीनों पाठ्यक्रमों में कुल 90 विद्यार्थियों की क्षमता के मुकाबले वर्तमान में केवल 18 विद्यार्थी शिक्षा ले रहे हैं. ऐसी स्थिति में यह सवाल उठ रहा है कि जब वर्तमान केंद्र में ही विद्यार्थियों की संख्या लगातार कम हो रही है, तो 82 करोड़ रुपये खर्च कर तैयार किए जा रहे नए परिसर में विद्यार्थियों की संख्या कैसे बढ़ेगी? यदि विद्यार्थी ही पर्याप्त संख्या में नहीं होंगे तो विशाल इमारतों, कक्षाओं, स्टूडियो, सभागृह, छात्रावास, प्रशासनिक सुविधाओं तथा प्राध्यापकों और कर्मचारियों के लिए बनाए जा रहे आवासों का पूर्ण क्षमता से उपयोग कैसे होगा, यह भी महत्वपूर्ण सवाल है.
* 15 एकड़ में अत्याधुनिक परिसर
बडनेरा क्षेत्र में करीब 15 एकड़ के परिसर में आईआईएमसी के लिए अत्याधुनिक शैक्षणिक सुविधाएं विकसित की जा रही हैं. पत्रकारिता और जनसंचार की शिक्षा के लिए बड़े पैमाने पर सरकारी निधि खर्च की जा रही है. करदाताओं के पैसे से तैयार हो रहे इस परिसर से प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में विद्यार्थी पत्रकारिता और जनसंचार की शिक्षा प्राप्त करेंगे, ऐसी अपेक्षा है. लेकिन मौजूदा प्रवेश स्थिति को देखते हुए केवल बुनियादी सुविधाओं का विस्तार करने के बजाय विद्यार्थियों की संख्या बढ़ाना और शिक्षा की गुणवत्ता सुधारना अधिक महत्वपूर्ण चुनौती बन गई है. इसी कारण 82 करोड़ रुपये के इस प्रकल्प की उपयोगिता पर चर्चा शुरू हो गई है.
* अनुभवी प्राध्यापकों को किनारे करने का आरोप
आईआईएमसी के अमरावती केंद्र की शैक्षणिक व्यवस्था को लेकर अब कुछ गंभीर आरोप भी सामने आए हैं. आरोप है कि अनुभवी और सक्षम प्राध्यापकों तथा कुशल मनुष्यबल को विभिन्न कारणों से संस्थान से बाहर किया गया. इसके बाद अपेक्षाकृत कम अनुभव वाले प्राध्यापकों के भरोसे पत्रकारिता के पाठ्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं. यह भी आरोप लगाया जा रहा है कि संस्थान के हित की बजाय अपनी पसंद के मनुष्यबल की नियुक्ति और चयन को प्राथमिकता देकर मनमाने ढंग से कामकाज किया जा रहा है. इन आरोपों की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच कर वास्तविक स्थिति सामने लाने की मांग अब जोर पकड़ रही है.
* अंग्रेजी पत्रकारिता की कक्षा में हिंदी में अध्यापन?
राष्ट्रीय स्तर की संस्था आईआईएमसी में अध्यापन की गुणवत्ता को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है. हालांकि, अमरावती केंद्र में अंग्रेजी पत्रकारिता पाठ्यक्रम की कक्षाओं में हिंदी के माध्यम से अध्यापन किए जाने का आरोप लगाया गया है. अंग्रेजी पत्रकारिता का अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों के भाषाई कौशल और शैक्षणिक गुणवत्ता पर इसका असर पड़ सकता है, ऐसी चिंता व्यक्त की जा रही है. पत्रकारिता के क्षेत्र में भाषा पर पकड़ अत्यंत महत्वपूर्ण होती है. ऐसे में अंग्रेजी पत्रकारिता पढ़ाने वाले प्राध्यापकों की विषय और भाषा पर पकड़ तथा अध्यापन के माध्यम को लेकर संस्थान को स्पष्ट भूमिका अपनाने की आवश्यकता है.
* ‘सफेद हाथी’ बनने से पहले आत्ममंथन जरूरी
एक तरफ 15 एकड़ में 82 करोड़ रुपये की लागत से विशाल शैक्षणिक परिसर तैयार किया जा रहा है, जबकि दूसरी ओर वर्तमान केंद्र में विद्यार्थियों की संख्या चिंताजनक रूप से कम है. हिंदी पत्रकारिता में शून्य प्रवेश, अंग्रेजी में 30 में से केवल 8 और मराठी में 30 में से सिर्फ 10 विद्यार्थी होने की स्थिति को देखते हुए नए परिसर की उपयोगिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है. भव्य इमारत और अत्याधुनिक सुविधाएं तैयार करना निश्चित रूप से उपलब्धि हो सकती है, लेकिन यदि वहां गुणवत्तापूर्ण शिक्षा लेने के लिए पर्याप्त संख्या में विद्यार्थी ही नहीं आए तो करोड़ों रुपये की यह आधारभूत संरचना अपेक्षित परिणाम कैसे देगी, यह बड़ा सवाल है. नए परिसर में कक्षाओं और स्टूडियो के साथ कार्यक्रमों के लिए विशाल सभागृह, विद्यार्थियों के लिए छात्रावास, शैक्षणिक एवं गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों तथा प्राध्यापकों के लिए आवास और प्रशासनिक सुविधाएं प्रस्तावित हैं. ऐसे में कम विद्यार्थी संख्या के बीच इन सभी सुविधाओं का पूर्ण उपयोग होगा या नहीं, इस पर भी सवाल उठ रहे हैं.
* पहले गुणवत्ता, फिर विस्तार
आईआईएमसी देश में पत्रकारिता और जनसंचार शिक्षा के क्षेत्र की प्रमुख संस्थाओं में से एक है. इसलिए अमरावती में इसका स्वतंत्र और आधुनिक परिसर तैयार होना विदर्भ के लिए निश्चित रूप से सकारात्मक कदम साबित हो सकता है. लेकिन इसके साथ शिक्षा की गुणवत्ता और प्रशासनिक पारदर्शिता पर भी ध्यान देना आवश्यक है. विद्यार्थियों की संख्या लगातार क्यों घट रही है? हिंदी पत्रकारिता पाठ्यक्रम में इस वर्ष एक भी विद्यार्थी ने प्रवेश क्यों नहीं लिया? अनुभवी प्राध्यापक और कुशल मनुष्यबल संस्थान से बाहर क्यों गए? नए मनुष्यबल की नियुक्ति प्रक्रिया कितनी पारदर्शी रही? अंग्रेजी पत्रकारिता का अध्यापन वास्तव में किस भाषा और किस पद्धति से किया जा रहा है? इन सवालों के जवाब आईआईएमसी प्रशासन को देने चाहिए, ऐसी मांग की जा रही है.
* केंद्र सरकार से निष्पक्ष जांच की मांग
82 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाले परिसर से पहले वर्तमान शैक्षणिक व्यवस्था की कमियों को दूर करने की जरूरत पर जोर दिया जा रहा है. केंद्र सरकार और खखचउ मुख्यालय के प्रशासन से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच करने की मांग की गई है. जांच में विद्यार्थियों की घटती संख्या के कारण, पाठ्यक्रमों में प्रवेश की स्थिति, प्राध्यापकों की नियुक्ति एवं कार्यप्रणाली, अध्यापन की गुणवत्ता तथा मनुष्यबल से जुड़े निर्णयों की समीक्षा करने की मांग है. एक ओर 82 करोड़ रुपये का भव्य परिसर तैयार होगा और दूसरी ओर यदि वहां पर्याप्त विद्यार्थी तथा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध नहीं होगी, तो इस पूरे प्रकल्प का उद्देश्य ही सवालों के घेरे में आ जाएगा. इसलिए अमरावती खखचउ के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि पहले गुणवत्ता और विद्यार्थियों का विश्वास हासिल किया जाए या केवल बुनियादी ढांचे का विस्तार किया जाए.





