माता-पिता की संपत्ति नहीं संतान, जीवनसाथी चुनना उसका अधिकार
नागपुर खंडपीठ का महत्वपूर्ण फैसला, मां की हेबियस कॉर्पस याचिका खारिज

नागपुर/दि.12 – बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि प्रौढ़ (बालिग) संतान माता-पिता की संपत्ति नहीं होती और उसे अपनी इच्छा से जीवनसाथी चुनने का पूर्ण अधिकार है. अदालत ने कहा कि यदि कोई बालिग युवती अपनी मर्जी से किसी व्यक्ति के साथ रहना चाहती है, तो उसे जबरन माता-पिता के पास भेजने के लिए हेबियस कॉर्पस याचिका का सहारा नहीं लिया जा सकता.
यह मामला नागपुर की एक युवती से जुड़ा है, जो 17 वर्ष की उम्र में ट्यूशन जाने के लिए घर से निकली थी, लेकिन वापस नहीं लौटी. परिवार द्वारा तलाश किए जाने पर सीसीटीवी फुटेज में वह एक युवक के साथ जाती दिखाई दी. पुलिस ने उसे खोजकर मां के सुपुर्द कर दिया था, लेकिन बाद में युवती फिर घर छोड़कर चली गई. इसके बाद युवती की मां ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया कि युवक ने उनकी बेटी को अवैध रूप से अपने पास रखा है और उस पर पोक्सो कानून के तहत कार्रवाई की जानी चाहिए.
सुनवाई के दौरान अदालत ने संबंधित युवती का बयान दर्ज किया. युवती ने स्पष्ट रूप से कहा कि वह अपनी इच्छा से युवक के साथ गई थी और आगे भी उसी के साथ रहना चाहती है. उसने यह भी कहा कि उस पर किसी प्रकार का दबाव नहीं है. अदालत ने पाया कि सुनवाई के समय युवती बालिग हो चुकी है और अपने जीवन से जुड़े निर्णय स्वयं लेने में सक्षम है.
खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि, बालिग संतान को अपना जीवनसाथी चुनने का संवैधानिक और वैधानिक अधिकार है. माता-पिता को उसकी स्वतंत्र इच्छा पर नियंत्रण का अधिकार नहीं दिया जा सकता. अदालत ने यह भी कहा कि बच्चों के हित और उनकी स्वतंत्रता को माता-पिता के अधिकारों से ऊपर रखा जाना चाहिए.
कोर्ट ने मां के उस आरोप को भी स्वीकार नहीं किया कि युवती को अल्पवयस्क रहते हुए युवक ने अवैध रूप से बंधक बनाकर रखा था. न्यायालय ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस प्रमाण नहीं है, जिससे अवैध हिरासत साबित हो सके. अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि हेबियस कॉर्पस याचिका तभी स्वीकार की जा सकती है, जब किसी व्यक्ति को अवैध रूप से हिरासत में रखा गया हो. इस मामले में ऐसा कोई तथ्य सिद्ध नहीं हुआ. इसी आधार पर हाईकोर्ट ने मां की याचिका खारिज कर दी.





