छोटी-छोटी शिकायतों के लिए नागरिक कोर्ट क्यों आए
आवेदनों पर समय पर निर्णय नहीं होने पर हाईकोर्ट ने जताई नाराजगी

नागपुर/दि.17– बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने नागरिकों के आवेदनों और अभ्यावेदनों पर समय सीमा के भीतर निर्णय न लिए जाने पर कडा रुख अपनाया है. कोर्ट ने सवाल उठाया कि, नागरिकों को अपनी छोटी-छोटी समस्याओं और शिकायतों के समाधान के लिए आखिर अदालत का दरवाजा क्यों खटखटाना पड रहा है.
न्यायमूर्ति अनिल पानसरे और न्यायमूर्ति निवेदिता मेहता की खंडपीठ ने हाल ही में तीन रिट याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की. याचिकाओं में अमरावती जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) और जिला स्वास्थ्य अधिकारी को लंबित आवेदनों पर निर्णय लेने का निर्देश देने की मांग की गई थी.
* दोषी अधिकारियों पर गिर सकती है गाज
खंडपीठ ने स्पष्ट किया है कि, यदि जांच में अधिकारियों की लापरवाही साबित होती है, तो 2005 के अधिनियम की धारा 10 के तहत उनके खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी. हालांकि, नियमानुसार कार्रवाई से पहले अधिकारियों को अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाएगा. सहायक सरकारी वकील को यह आदेश संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाने का निर्देश दिया गया है. मामले की अगली सुनवाई 25 अगस्त को होगी.
* आदेश के बाद भी अधिकारी फैसला नहीं लेते
कोर्ट ने कहा, अधिकारियों को केवल आवेदनों पर निर्णय लेने का निर्देश देने के लिए याचिकाएं दाखिल होना अब एक आम बात हो गई है. कोर्ट के आदेश के बाद भी कई बार अधिकारी फैसला नहीं लेते. जिससे नागरिकों को दोबारा अवमानना याचिका दायर करने पर मजबूर होना पडता है. महाराष्ट्र शासकीय कर्तव्यों के निर्वहन में विलंब की रोकथाम अधिनियम, 2005 की धारा 10 के तहत नागरिकों को तय समय-सीमा में फैसला पाने का कानूनी अधिकार है, फिर भी इसमें देरी हो रही है. हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के संबंधित अधिकारियों को पूरे मामले की समीक्षा करने और ऐसी व्यवस्था बनाने के निर्देश दिए है, ताकि नागरिकों को अदालतों के चक्कर न लगाने पडे.





