24 वर्षों बाद देश में नई सहकारी बैंकों का रास्ता खुला
आरबीआई ने जारी किया ‘ऑन-टैप’ लाइसेंस का मसौदा, कड़े मानदंडों के कारण सीमित संस्थाओं को ही मिल सकती है पात्रता

नागपुर/दि.14- देश में लगभग 24 वर्षों बाद नई शहरी सहकारी बैंकों (अर्बन को-ऑपरेटिव बैंक) की स्थापना का मार्ग प्रशस्त होता दिखाई दे रहा है. भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने नई सहकारी बैंकों को ‘ऑन-टैप’ आधार पर लाइसेंस देने के लिए मसौदा दिशा-निर्देश जारी किए हैं. इससे आर्थिक रूप से मजबूत सहकारी पतसंस्थाओं को बैंकिंग क्षेत्र में प्रवेश का अवसर मिलेगा. हालांकि, मसौदे में रखी गई कठोर वित्तीय और प्रशासनिक शर्तों के कारण विशेषज्ञों का मानना है कि बहुत कम संस्थाएं इन मानकों पर खरी उतर पाएंगी.
* केवल मजबूत पतसंस्थाओं को मिलेगा मौका
आरबीआई के मसौदे के अनुसार, आवेदन करने वाली संस्था का कम से कम 10 वर्षों से संचालन में होना आवश्यक है. इसके अलावा संस्था के पास न्यूनतम 10 हजार करोड़ रुपये की जमा राशि (डिपॉजिट) और कम से कम 300 करोड़ रुपये की शुद्ध संपत्ति (नेटवर्थ) होना अनिवार्य होगा. साथ ही संस्था की गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां (एनपीए) 3 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए तथा पूंजी पर्याप्तता अनुपात (कैपिटल एडिक्वेसी रेशियो) कम से कम 12 प्रतिशत होना जरूरी होगा. पिछले पांच वर्षों का वित्तीय प्रदर्शन भी संतोषजनक होना चाहिए.
* निदेशकों की होगी कड़ी जांच
मसौदे में स्पष्ट किया गया है कि आवेदनकर्ता संस्था का पंजीकरण बहुराज्यीय सहकारी संस्था अधिनियम, 2002 के तहत होना चाहिए. किसी एक सदस्य के पास 5 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी नहीं हो सकती. आरबीआई निदेशकों की योग्यता, ईमानदारी और वित्तीय पृष्ठभूमि की भी जांच करेगा. किसी बैंक या वित्तीय संस्था का बकायादार व्यक्ति निदेशक बनने के लिए पात्र नहीं होगा.
* महाराष्ट्र की कुछ संस्थाएं ही मानकों के करीब
सहकार क्षेत्र के जानकारों के अनुसार महाराष्ट्र की बुलढाणा अर्बन को-ऑपरेटिव क्रेडिट सोसायटी जैसी कुछ बड़ी संस्थाएं ही वर्तमान मानकों के करीब पहुंचती हैं. यदि मसौदे में प्रस्तावित शर्तें यथावत रहीं तो पूरे देश में केवल चार से पांच पतसंस्थाएं ही बैंक का दर्जा प्राप्त कर सकेंगी. विशेषज्ञों का कहना है कि यदि न्यूनतम जमा राशि की सीमा 10 हजार करोड़ रुपये से घटाकर 1 हजार करोड़ रुपये कर दी जाए तो देशभर में लगभग 100 नई सहकारी बैंकों की स्थापना का मार्ग खुल सकता है.
* 18 महीने में पूरी करनी होंगी तैयारियां
आरबीआई से सैद्धांतिक मंजूरी मिलने के बाद संस्था को सूचना प्रौद्योगिकी, साइबर सुरक्षा और पूर्णतः कंप्यूटरीकृत बैंकिंग व्यवस्था विकसित करनी होगी. इसके लिए अधिकतम 18 महीने का समय दिया जाएगा. अंतिम लाइसेंस प्राप्त होने के छह महीने के भीतर बैंकिंग कारोबार शुरू करना अनिवार्य होगा. संस्थाओं को पांच वर्षीय व्यवसाय योजना, शाखा विस्तार, वित्तीय समावेशन, जोखिम प्रबंधन, मानव संसाधन योजना और प्राथमिकता क्षेत्र में ऋण वितरण की विस्तृत जानकारी भी प्रस्तुत करनी होगी.
* विस्तृत जांच के बाद मिलेगा लाइसेंस
आवेदन के साथ दो-तिहाई बहुमत से पारित प्रस्ताव, केंद्रीय सहकारी संस्था निबंधक का अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) तथा पिछले पांच वर्षों के लेखापरीक्षित वित्तीय विवरण प्रस्तुत करने होंगे. आरबीआई द्वारा प्राथमिक जांच, निदेशकों का सत्यापन और संस्था के निरीक्षण के बाद आंतरिक जांच समिति की सिफारिश पर केंद्रीय बोर्ड अंतिम निर्णय लेगा.
* नीति को अधिक व्यावहारिक बनाने की मांग
सहकार क्षेत्र के विशेषज्ञों ने आरबीआई के इस कदम का स्वागत किया है, लेकिन उनका मानना है कि 10 हजार करोड़ रुपये की जमा राशि, बहुराज्यीय पंजीकरण और अन्य कठोर शर्तों के कारण कई सक्षम राज्य स्तरीय सहकारी संस्थाएं इस प्रक्रिया से बाहर रह जाएंगी. सहकार भारती, महाराष्ट्र प्रदेश के महामंत्री एवं राज्य सहकार नीति उच्चस्तरीय समिति के सदस्य विवेक जुगाडे ने कहा कि नई सहकारी बैंकों को अनुमति देने का निर्णय सकारात्मक है, लेकिन अंतिम नीति बनाते समय सहकार क्षेत्र के विशेषज्ञों की राय लेकर मानदंडों को अधिक व्यावहारिक और समावेशी बनाया जाना चाहिए. आरबीआई के इस प्रस्ताव को सहकारी बैंकिंग क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण बदलाव माना जा रहा है, जिससे भविष्य में मजबूत सहकारी संस्थाओं को बैंकिंग व्यवस्था का हिस्सा बनने का अवसर मिल सकता है.





