अगले 31 साल में यवतमाल में 14 साल सूखे का अनुमान

क्लाइमेट चेंज के असर को लेकर कृषि विश्वविद्यालय की रिसर्च में चौंकाने वाले निष्कर्ष

 2055 तक पानी बचाने और सूखा-रोधी खेती की जरूरत
यवतमाल/दि.9 – आने वाले वर्षों में जलवायु परिवर्तन यवतमाल जिले के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है. डॉ. पंजाबराव देशमुख कृषि विश्वविद्यालय, अकोला के सिंचाई एवं जल निकासी अभियांत्रिकी विभाग के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए शोध में अनुमान लगाया गया है कि वर्ष 2025 से 2055 के बीच अगले 31 वर्षों में यवतमाल जिले को करीब 14 वर्ष सूखे का सामना करना पड़ सकता है. यह अवधि कुल 31 वर्षों का करीब 45.2 प्रतिशत है.
पश्चिम विदर्भ के अन्य जिलों की तुलना में यवतमाल में सूखे वाले वर्षों का अनुपात सबसे अधिक रहने का अनुमान है. इस शोध के निष्कर्षों को देखते हुए जिले में लंबे समय के लिए जल संरक्षण, माइक्रो इरिगेशन और सूखा-रोधी कृषि की रणनीति तैयार करने की आवश्यकता जताई गई है. किसानों के साथ-साथ प्रशासन और आम नागरिकों के स्तर पर भी जल प्रबंधन को प्राथमिकता देने की जरूरत है.
* नासा के आंकड़ों और 23 वर्षों की बारिश का विश्लेषण
‘इंटरनेशनल जर्नल ऑफ रिसर्च इन एग्रोनॉमी’ में प्रकाशित इस अध्ययन में वर्ष 2025 से 2055 के दौरान बारिश के संभावित रुझान का अनुमान लगाने के लिए नासा के सैटेलाइट डेटा के साथ 23 वर्षों के वर्षा संबंधी आंकड़ों का विश्लेषण किया गया. अध्ययन में पश्चिम विदर्भ के अमरावती, अकोला, बुलढाणा, वाशिम और यवतमाल जिलों को शामिल किया गया. शोध के अनुसार, आने वाले वर्षों में बुलढाणा और अकोला में बारिश की मात्रा बढ़ने का अनुमान है, जबकि यवतमाल में वर्षा का स्तर अपेक्षाकृत कम रहने की संभावना जताई गई है.
* 31 वर्षों में 14 साल सूखे के
2025 से 2055 तक के 31 वर्षों के अनुमान में यवतमाल में 14 वर्ष सूखे वाले, 9 वर्ष अधिक वर्षा वाले और 8 वर्ष सामान्य वर्षा वाले रहने का अनुमान है. यानी जिले में करीब 45.2 प्रतिशत समय बारिश की कमी की स्थिति बन सकती है. पश्चिम विदर्भ के पांचों जिलों में सूखे वाले वर्षों का अनुपात यवतमाल में सबसे अधिक रहने का अनुमान सामने आया है.
* 2025-35 की अवधि बेहद संवेदनशील
शोध में 2025 से 2035 के बीच की शुरुआती अवधि को विशेष रूप से महत्वपूर्ण बताया गया है. इस दौरान यवतमाल में लगातार या बार-बार सूखे के वर्ष आने का खतरा रहने का अनुमान है. शोध के मुताबिक पश्चिम विदर्भ के सभी जिलों में भी कुछ वर्षों तक एक साथ गंभीर सूखे जैसी स्थिति बनने की संभावना है. वहीं, 2046 से 2055 के दशक में बारिश की मात्रा में अचानक बढ़ोतरी और भारी बारिश की घटनाओं की आवृत्ति बढ़ने का अनुमान व्यक्त किया गया है. इससे एक ओर सूखे और दूसरी ओर अचानक होने वाली अतिवृष्टि, दोनों परिस्थितियों से निपटने की चुनौती बढ़ सकती है.
* कपास-सोयाबीन पर बढ़ेगा दबाव
लगातार सूखे और बारिश में अनिश्चितता का सीधा असर यवतमाल की प्रमुख फसलों कपास और सोयाबीन पर पड़ने की आशंका है. बारिश की कमी के कारण कुओं और बोरवेल के जलस्तर में गिरावट आने का खतरा भी बढ़ सकता है. ऐसे में भविष्य के लिए फसल पद्धति में बदलाव की आवश्यकता पर जोर दिया गया है. अधिक पानी की जरूरत वाली फसलों के बजाय सूखा सहन करने वाली फसल किस्मों को प्राथमिकता देने के साथ अरहर, मूंग जैसी दलहन तथा ज्वार और बाजरा जैसे मोटे अनाज की खेती को बढ़ावा देना उपयोगी साबित हो सकता है.
* पानी की हर बूंद के लिए अभी से नियोजन जरूरी
जलवायु परिवर्तन के संभावित प्रभावों को देखते हुए जल संरक्षण को लेकर अभी से दीर्घकालीन योजना बनाने की जरूरत है. खेत तालाब, जलसंधारण, माइक्रो इरिगेशन, वर्षा जल संचयन और भूजल पुनर्भरण जैसे उपायों को प्रभावी ढंग से लागू करना महत्वपूर्ण होगा. शोध के निष्कर्षों के अनुसार, भविष्य में सूखे और अतिवृष्टि दोनों परिस्थितियों से निपटने के लिए यवतमाल को अभी से जल एवं कृषि नियोजन की दिशा में ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है.

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