630 ग्राम के शिशु ने 84 दिनों में जीती जिंदगी की जंग
शालिनीताई मेघे अस्पताल के चिकित्सकों का कमाल

* 69 दिनों तक केवल मशीन के सहारे चली सांस
* मेडिकल टीम की कोशिशें बनी मिसाल
नागपुर/दि.8 – जन्म के समय महज 630 ग्राम वजन और आकार इतना छोटाा कि एक हथेली में आए. मां के गर्भ से बाहर आते ही उसे सांस लेने के संघर्ष के साथ कई चुनौतियों का सामना करना पडा. समय से पहले जन्म (प्रीमेच्योर ) की वजह से दिक्कते ब्लड इंफेक्शन, बार-बार सांस रूकना (एप निया), गंभीर एनिमिया और कमजोर हड्डियां इन सब समस्याओं की वजह से हर दिन मौत से जंग थी. फिर भी इस नन्हीं जान ने हार नहीं मानी और डॉक्टरों ने अपनी पूरी कोशिश जारी रखी. आखिरकार 84 दिनो के लगातार इलाज के बाद शिशु और मेडिकल टीम दोनों ने यह जंग जीत ली. हिंगणा तहसील के माला परिवार में जुडवा बच्चों का जन्म हुआ. दोनों में से पहला बच्चा समय से पहले, यानी गर्भावस्था के सिर्फ 28 से 29 हफ्ते में पैदा हुआ था और उसका वजन सिर्फ 630 ग्राम था. कम वजन और समय से पहले जन्म के कारण , बच्चे की हालत गंभीर थी और उसे तुरंत वानडोंगरी के शालिनीताई मेघे अस्पताल के नियोनेटल इंटेसिव केयर यूनिट में भर्ती कराया गया. शुरूआत दिन बहुत मुश्किल से भरे थे. बच्चे की सांस लेने के लिए रिेस्परेटरी सपोर्ट की जरूरत थी और हर पल मेडिकल टीम और परिवार के लिए एक इम्तिहान जैसा था.
* एनीमिया के कारण कई बार खून चढाने की जरूरत पडी
इलाज के दौरान बच्चे को कई गंभीर दिक्कतों का सामना करना पडा. एनीमिया के कारण उसे कई बार खून चढाना पडा. हर पल सांस रूकने का खतरा होने के कारण लगातार निगरानी जरूरी था. नियंत्रित मात्रा में ऑक्सीजन और आधुनिक उपचार पध्दतियों की मदद से डॉक्टरों ने उसकी स्थिति में धीरे-धीरे सुधार किया. लगातार 69 दिनों तक रेस्पिरेटरी सपोर्ट पर रहने के बाद शिशु ने स्वयं सांस लेना शुरू कर दिया.
* मेडिकल टीम की कोशिशों की मिसाल
लगातार 84 दिनों तक चले उपचार के बाद शिशु को स्वस्थ अवस्था में अस्पताल से छुट्टी दे दी गई. नन्हें बच्चे को गोद में लेकर जब परिजन अस्पताल से बाहर निकले तो डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ के चेहरों परभी संतोष और खुशी साफ दिखाई दे रही थी. जटिल उपचार का नेतृत्व एनआईसीयू प्रभारी डॉ. कुश झुनझुनवाला और बाल रोग विभागाध्यक्ष डॉ. सी. एम. बोकाडे के मार्गदर्शन में डॉ. नीलेश दाररव्हेकर डॉ. इशनी अरोरा, डॉ. पूनम उके, डॉ. हिना भांडेकर, डॉ. अश्विन मेश्राम, डॉ. हर्ष सोनक, डॉ. पार्थिव, डॉ. दीक्षा, डॉ. शुभम, डॉ. शाश्वत, डॉ. विक्रमजीत, डॉ. अंशुल, डॉ. मयूरी, डॉ. पुष्पा, डॉ. रिकेन और डॉ. गझनफर की पूरी टीम ने समर्पण के साथ उपचार किया. जिससे नन्हें योद्धा को नया जीवन मिल सका.





