केवल आरोप लगाने से दहेज मांगने का आरोप साबित नहीं होता
बुलढाणा जिले के आत्महत्या मामले में हाईकोर्ट का निरीक्षण

नागपुर/दि.28– विवाह पश्चात सात वर्ष के भीतर विवाहिता की संदेहास्पद तरीके से अथवा विष प्राशन करने की वजह से मौत होने पर मृत्यु से पहले उसे दहेज अथवा किसी अन्य वजह के चलते क्रूरतापूर्वक प्रताडित किया गया था. यह बात केवल आरोप लगाने से साबित नहीं होती. आरोपी के कृत्य अथवा आत्महत्या का सीधा संबंध दर्शानेवाला कोई ठोस सबूत उपलब्ध नहीं रहने पर आरोपी को संदेह का लाभ मिलता है. ऐसा निष्कर्ष दर्ज करते हुए मुंबई उच्च न्यायालय की नागपुर खंडपीठ ने आत्महत्या कर चुकी विवाहिता के पति व देवर को निर्दोषमुक्त करने के निर्णय को कायम रखा है.
जानकारी के मुताबिक बुलढाणा जिले की खामगांव तहसील अंतर्गत हिवरा बुद्रुक निवासी संतोष अवधुत करंगले के साथ संध्या बागडे नामक युवती का विवाह 1 मई 2006 को हुआ था. जिसके बाद डेढ साल में ही यानी 12 दिसंबर 2007 को विषप्राशन करने की वजह से संध्या की मौत हो गई थी. जिसके चलते संध्या के पिता ने ससुरालियों के खिलाफ पिपलगांव राजा पुलिस थाने में शिकायत दर्ज करते हुए आरोप लगाया था कि 5 हजार रूपयों की मांग सहित अन्य कुछ कारणों के चलते संध्या को शारीरिक व मानसिक तौर पर प्रताडित किया जा रहा था. जिसके चलते उसने आत्महत्या कर ली थी. शिकायत के आधार पर पिपलगांव राजा पुलिस ने भादंवि की धारा 498 (अ), 304 (ब) व 306 के तहत प्रताडना, दहेज बली व आत्महत्या हेतु प्रवृत्त करने का मामला दर्ज किया था. परंतु इस मामले की सुनवाई करते हुए खामगांव सत्र न्यायालय ने आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए निर्दोषमुक्त कर दिया था. जिसके खिलाफ राज्य सरकार ने मुंबई हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ में याचिका दायर की थी. जिस पर सुनवाई करते हुए न्या. उर्मिला जोशी पालके व न्या. निवेदिता मेहता की दो सदस्यीय खंडपीठ ने राज्य सरकार की याचिका को खारिज कर दिया.
* पारिवारिक विवाद यानी क्रूरता नहीं
इस मामले की सुनवाई करते हुए अदालत का कहना रहा कि भादंवि की धारा 498 (अ) के तहत अपराध दर्ज करने हेतु आरोपी का व्यवहार गंभीर व हेतु परस्पर रहना चाहिए. जिसकी वजह से महिला के पास आत्महत्या के अलावा अन्य कोई पर्याय शेष नहीं रहनेवाली स्थिति हो. केवल ससुरालियों के साथ छिटपुट विवाद होने या आरोप प्रत्यारोप होने को क्रूरता नही कहा जा सकता. साथ ही आत्महत्या हेतु प्रवृत्त करने के अपराध को साबित करने हेतु आरोपी का अपराधिक उद्देश्य भी दिखाई देना चाहिए, ऐसा भी हाईकोर्ट का कहना रहा.





